GK IIमध्यकालीन धार्मिक आन्दोलन Part – 1 मध्यकालीन धार्मिक आन्दोलन Part – 1 II madhyakalin dharmik aandolan II


  मध्यकालीन धार्मिक आन्दोलन Part – 1

GK IIमध्यकालीन धार्मिक आन्दोलन Part – 1 मध्यकालीन धार्मिक आन्दोलन Part – 1 II madhyakalin dharmik aandolan II ,madhyakalin dharmikaandolan
भक्त कवि


    1.            महबूब-ए-इलाही उपाधि निजामुद्दीन औलिया की थी. चिश्ती संत शेख निजामुद्दीन औलिया शेख फरीद शेख फरीद के सबसे बुद्धिमान शिष्य थे. इन्होंने अपना मुख्यालय (खानकाह) दिल्ली के पास गियासपुर में स्थापित किया इनका मकबरा भी दिल्ली में स्थित है.
    2.            निजामुद्दीन औलिया अर्थात सुल्तानों का सुल्तान भी कहा गया.
    3.            ‘सूरसागर’ के रचयिता सूरदास है. सूरदास सगुण विचार धारा के कृष्ण भक्ति शाखा के संत थे. कृष्ण इंक आराध्य देव थे.  
    4.            सूरदास की कृष्ण भक्ति सखाभाव की भक्ति है. 
    5.            भक्ति के क्षेत्र में इन्हें पुष्टि मार्ग का जहाज कहा गया है. 
    6.            सूरदास वल्लभाचार्य के शिष्य थे. 
    7.            भक्ति आन्दोलन में प्रमुख संतों ने संस्कृत की जगह क्षेत्रीय भाषा में लोगों को उपदेश दिया जिससे प्रांतीय भाषाओँ के विकास को बल मिला, इन लोगों ने जातिवाद का विरोध किया तथा हिन्दू धर्म में सुधार का प्रयास किया. भक्ति सुधारकों ने मानव जाति की समानता में विश्वास किया और हिन्दू-मुस्लिम भाईचारे का समर्थन किया. 
    8.            भक्ति सुधारकों ने पुरोहित के प्रभुत्व को स्वीकार करने से इंकार कर दिया. 
    9.            इन लोगों ने सभी प्रकार के अंधविश्वासों और अर्थहीन कर्मकांडों का खुलकर बहिष्कार किया. 
10.            सभी भक्ति सुधारकों ने गुरु की महत्ता पर बल दिया. इनके उपदेशों में नैतिक शिक्षा इनके उपदेश का अनिवार्य अंग थी.  
11.            भारत में सुहरावर्दी पंथ की स्थपना शेख बहाउद्दीन जकारिया ने किया था. ये भारत में मुल्तान से आए और इस सिलसिले का प्रचार प्रसार किया. इन्होंने समकालीन राज्य की राजनीति में भाग लिया. नासिरुद्दीन कुबाचा एवं इल्तुतमिश के बीच मुल्तान के अधिपत्य के लिए संघर्ष चल रहा था, इसमें इन्होंने इल्तुतमिश का साथ दिया. 
12.            इल्तुतमिश नेशेख बहारुद्दीन जकरिया को ‘शेख-उल-इस्लाम’ की उपाधि प्रदान की. 
13.            इनके बाद इनके बेटे सदरुद्दीन उत्तराधिकारी हुए. 
14.            इन्होंने बलबन के बेटे मुहम्मद की पत्नी से विवाह किया. 
15.            ‘पद्मावत’ के रचयिता मलिक मोहम्मद जायसी हैं. 
16.            जायसी की अन्य रचनाएँ हैं – ‘अखरावट’ और आखिरी कलाम’. 
17.            जायसी का जन्म 1493 ई. में अवध के जायस ग्राम में हुआ था. 
18.            जायसी ने ‘पद्मावत’ प्रेमकथा के द्वारा संपूर्ण सुफिवादी दर्शन को प्रस्तुत करने का प्रयास किया है. 
19.            संत दादू दयाल ने निपक्ष (निपख) मार्ग का अनुमोदन किया. इनका जन्म अमहमदाबाद में 1544 ई. में हुआ था. 
20.            इन्होंने परमब्रह्म संप्रदाय की स्थापना कर गुजरात एवं राजस्थान में भक्ति का प्रचार प्रसार किया. 
21.            गरीबदास, मुहम्मद काजी, सुन्दरदास और रज्जब इनके प्रमुख शिष्य थे. रज्जब का कहना था कि ‘यह संसार वेद है, यह सृष्टि कुरान है.’
22.            शेख निजामुद्दीन औलिया का जन्म बदायूं में 1236 ई. में हुआ था. ये शेख फरीद के शिष्य थे. शेख फरीद की दरगाह पगपाटन में है, इनका मकबरा भी दिल्ली में स्थित है. 
23.            निजामुद्दीन चिश्ती सिलसिले के महान संत थे. इन्हें यौगिक क्रियाओं में महारत हासिल थी. 
24.            यह ‘महबूब-ए-इलाही’ थी ‘सुल्तान-उल-औलिया’ के नाम से जाने जाते थे. 
25.            औलिया ने शेख सिराजुद्दीन उस्मानी को ‘आइन-ए-हिन्द’ (भारत का दर्पण) की उपाधि से विभूषित किया. 
26.            ‘प्रेम वाटिका’ के रचनाकार रसखान हैं. इनका जन्न दिल्ली के पठान राजवंश में हुआ था. ऐसे मुलसमान भक्त कवियों को देखकर भी भारतेन्दु जी ने  कहा था – ‘इन मुसलमान हरिजनन पै कोटिन हिन्दुन वारिए.’ 
27.            रसखान की ‘प्रेम वाटिका’ और ‘सुजान रसखान’ प्रसिद्ध रचनाएँ हैं. 
28.            रसखान की भाषा अधिकतर विशुद्ध ब्रज भाषा है. 
29.            रसखान केवल कृष्ण के चित्र को देखकर उनकी ओर आकर्षित हो गए थे. 
30.            वल्लाभाचार्य कृष्ण भक्ति शाखा के महान संत थे. इनका मानना था कि भगवान कृष्ण ही ब्रह्म हैं. इनके भक्ति मार्ग को पुष्टि मार्ग कहा जाता है. 
31.            वल्लाभाचार्य ने शुद्धाद्वैतावाद मत का समर्थन किया. 
32.            सूरदास वल्लाभाचार्य ने कभी भी संन्यास ग्रहण नहीं किया.  
33.            निम्बार्कचार्य ने द्वैताद्वैत के सिद्धांत का प्रतिपादन किया जो भेदाभेद सिद्धांत के नाम से लोकप्रिय हुआ. निम्बार्का ने मथुरा के निकट ब्रज में आपना आश्रम स्थापित किया. इन्हें विष्णु के आयुध चक्र सुदर्शन का अवरतार माना जाता है. 
34.            इनके सप्रदाय का नाम सनक संप्रदाय था. 
35.            इन्होंने ‘वेदान्त पारिजात सौरभ’ तथा दसश्लोकी सिद्धांतरत की रचना की. 
36.            इन्होंने आत्मासमर्पण का मत प्रतिपादित किया और राधाकृष्ण को आराध्य देव माना. 
37.            वारकरी संप्रदाय के प्रमुख देवता विट्ठल अथवा बिठोवा जी हैं. 
38.            वारकरी संप्रदाय में विट्ठल भगवान की आराधना की जाती है. इसके प्रमुख संत तुकाराम, ज्ञानेश्वर और नामदेव हैं. 
39.            महाराष्ट्र में सामाजिक और धार्मिक क्रान्ति लाने का श्रेय ज्ञानेश्वर, नामदेव, तुकाराम और रामदास जैसे भक्ति सुधारकों को दिया जाता है. 
40.            महाराष्ट्र में धरकरी संप्रदाय के संस्थापक रामदास थे. इसके अनुयायी राम की पूजा करते हैं और यह चिन्तन प्रधान संप्रादय है. 
41.            उत्तर भारत का भक्ति आन्दोलन राम अरु कृष्ण की भक्ति के इर्द-गिर्द विकसित हुआ और इसका श्रेय रामानन्द को जाता है. 
42.            भक्तिआन्दोलन के संत निम्बकाचार्य ने मथुरा के निकट ब्रज में अपना आश्रम स्थापित किया. 
43.            निम्बार्काचार्य को विष्णु के आयुध चक्र ‘सुदर्शन’ का अवतार माना जाता है. 
44.            बल्लभाचार्य कृष्ण भक्ति शाखा के महान संत थे इन्होंने वृन्दावन में श्रीनाथ जी एक मंदिर बनवाया. 
45.             भक्ति आन्दोलन के सर्वप्रथम प्रतिपादक रामानुजाचार्य का जन्म 1017 ई. में दक्षिण भारत में हुआ था. इन्होंने प्रारंभिक शिक्षा दक्षिण में कांची नामक स्थान से प्राप्त की थी. इन्होंने श्रीरंगम में आचार्य के पद पर रहते हुए वैष्णव धर्म का प्रचार-प्रसार किया. 
46.            प्रारंभ में ये कांची के यादव प्रकाश के शिष्य थे बाद में येयमुनाचार्य के शिष्य हो गए. 
47.            इन्होंने ने शंकर के अद्वैतवाद का खण्डन किया और विशिष्टाद्वैत के सिद्धांत का प्रतिपादन किया. 
48.            इन्होंने शंकर के अद्वैतवाद का खण्डन किया और विशिष्टाद्वैत के सिद्धांत का प्रतिपादन किया. 
49.             इन्होंने वेदान्तर, वेदान्त संग्रह, वेदान्तदीप जैसे ग्रंथों की रचना की और ब्रह्मसूत्र और भगवतगीता पर भाष्य लिखा. 
50.            इन्होंने ब्रह्म को निर्गुण न मानकर सगुण माना और मोक्ष प्राप्ति के लिए भक्ति को ही एकमात्र साधन माना. 
51.            महाराष्ट्र में भक्ति आन्दोलन को लोकप्रिय बनाने में नामदेव की महतवपूर्ण भूमिका थी. इनका जन्म 1270 ई. में पंढरपुर में हुआ था. इनके गुरु ज्ञानेश्वर थे. नामदेव ‘बारकारी संप्रदाय’ से संबंधित थे. चैतन्य महाप्रभु का जन्म बंगाल के नदिया जिले में हुआ था. चैतन्य क बचपन का नाम ‘निमाई’ था. चैतन्य ने कृष्ण को अपना आराध्य बनाया और उन्हीं की भक्ति का प्रचार किया. सूरदास भक्ति आन्दोलन के कृष्णमार्गी शाखा के प्रमुख संत थे. इनका जन्म रुनकता गाँव पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हुआ था. गुरुनानक का जन्म तलवंडी (आधुनिक ननकाना साहिब, पाकिस्तान) में हुआ था. इन्होंने उत्तर-पश्चिम भारत में भक्ति आन्दोलन क सूत्रपात किया. 
52.            चैतन्य का वास्तविक नाम ‘विश्वंभर’ था. 
53.            ये ‘गौरंगमहाप्रभु’ नाम से प्रसिद्ध थे. 
54.            चैतन्य ने आधुनिक वैष्णववाद जिसे गौडीय वैष्णव धर्म कहा गया का प्रचार किया. इन्होंने भक्ति के कीर्तन प्रणाली की शुरुआत की. 
55.            चैतन्य के दार्शनिक सिद्धांत को ‘अचिन्त्य-भेदा-भेद’ के नाम से जाना जाता है. 
56.            सूरदास वल्लाभाचार्य के शिष्य थे. ये मुगल शासक अकबर के समकालीन थे. 
57.            नामदेव ने अनेक भक्तिपरक मराठी गीतों की रचना की जो अभंगों’ के रूप में प्रसिद्ध है.

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