ईंधन II Fuel
ईंधन
वे सब पदार्थ जो अकेले या अन्य पदार्थों से प्रतिक्रिया करके ऊष्मा
प्रदान करते हैं, ईंधन कहलाते हैं. अधिकांश ईधनों में कार्बन उपस्थित रहता है. इन
ईधनों को वायु में जलाने पर ऊष्मा प्राप्त होती है.
ईंधन की विशेषता :
एक आदर्श ईंधन या उत्तम कोटि के ईंधन में
निम्नलिखित विशेषताएँ होनी चाहिए:
a.
ईंधन
सस्ता व आसानी से प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होना चाहिए
b.
इसके
भंडारण और इसे एक जगह से दूसरी जगह ले जाने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए.
c.
वह
आसानी से जलने लायक हो और जलने के फलस्वरूप किसी हानिकारक गैस की उत्पत्ति नहीं
होनी चाहिए
d.
इसका
ऊष्मीय मान उच्च होना चाहिए
e.
इसका
ज्वलन ताप उपयुक्त होना चाहिए.
f.
इसका
दहन न तो अत्यंत मंद और न अत्यंत तीव्र होना चाहिए.
g.
इसमें
अवाष्पशील पदार्थो की मात्रा कम होनी चाहिए.
गैसीय ईंधन की विशेषताएँ :
h.
इन्हें
आसानी से जलाया या बुझाया जा सकता है.
i.
इनके
प्रयोग से राख एवं धुआँ नहीं बनता हैं. इन्हें ऐच्छिक स्थान पर ले जाकर ऊष्मा
प्राप्त की जा सकती है.
j.
इनसे
अधिक मात्रा में ऊष्मा प्राप्त होती है.
k.
इनके
प्रवाह को आसानी से कम या तेज किया जा सकता है.
l.
इसने
प्राप्त ऊर्जा व्यर्थ नहीं होती है.
सामान्य प्रयोग में आने वाले ईंधन गैसें :
कोल गैस : यह कई
दहनशील गैसों का मिश्रण होता है. इसका संघटन कोयले की किस्म और भंजक स्रवण के ताप
पर निर्भर करता है. इसकी औसत प्रतिशत रचना इस प्रकार है जैसे : हाइड्रोजन – 55%,
मीथेन-30%, कार्बन मोनोऑक्साइड-4%, असंतृप्त हाइड्रोकार्बन – 3% और अज्वलनशील
अशुद्धियाँ – (CO2,
N2, O2) -
8%
इनमें से प्रथम तीन
अवयव जो तनुकारी पदार्थ कहलाते हैं, जलकर ऊष्म देते हैं, जबकि असंतृप्त
हाइड्रोकार्बन प्रकाश उत्पादक होता है और यह प्रदीप अंग कहलाता है. यह जलाने पर
प्रकाश उत्पन्न करने में तथा धातुकर्म में अवकरण के लिए प्रयुक्त होती है.
भाप
अंगार गैस :
यह कार्बन
मोनोऑक्साइड और हाइड्रोजन का आण्विक मिश्रण होता है. इसमें अशुद्धियों के रूप में
CO2, H2O और N2 रहता है. इसे रक्ततप्त कोक पर भाप की धारा
प्रवाहित करके प्राप्त किया जाता है. इसका कैलोरी मान प्रोड्यूशर गैस से अधिक होता
है. यह अकेले अथवा कोल गैस के साथ मिलकर ईंधन के रूप में प्रयोग में लायी जाती है.
यह हाइड्रोजन गैस बनाने के काम आती है, जो अमोनिया के औद्दोगिक उत्पादन में उपयोगी
है. इससे मिथाइल एल्कोहाल भी बनाया जाता है.
वायु अंगार गैस:
यह कार्बन
मोनोऑक्साइड और नाइट्रोजन का मिश्रण होता है. जिसमें अयातानुसार दो भाग नाइट्रोजन
और एक भाग कार्बन मोनोऑक्साइड होता है. इसमें अशुद्धि के रूप में थोड़ा कार्बन
डाईऑक्साइड मौजूद रहता है. इसका कैलोरी मान अन्य ईंधनों की तुलना में सबसे कम होता
है. यह एक सस्ता ईंधन है, जो जलकर उच्च ताप देता है. काँच के निर्माण तथा
निष्कर्षण , में इसका बहुधा उपयोग होता है.
तेल गैस :
यह सरल, संतृप्त एवं
हाइड्रोकार्बन का मिश्रण होता है. जैसे मीथेन, एसितिलिन, इथिलिन आदि. यह मिट्टी के
तेल या पेट्रोलियम के भंजक स्रवण द्वारा तैयार की जाती है. इस गैस में वायु मिलाकर
प्रयोगशाला में बर्नर जलाये जाते हैं.
प्राकृतिक गैस :
प्रेट्रोलियम के
कुओं से निकलने वाली गैसों में मुख्य रूप से मीथेन तथा ईंधन (क्रमश: 83% और 16%)
होती है, जो ज्वलनशील होने के कारण ईंधन के रूप में प्रयुक्त किओ जाती है. प्राप्त
ऊष्मा की मात्रा के आधार पर प्राक्रतिक गैस सर्वश्रेष्ठ ईंधन है. प्राकृतिक गैस
तेल के कुओं से भी उपफल के रूप में प्राप्त किया जाता है. इस गैस का प्रधान अवयव
मीथेन होता है. प्राकृतिक गैस का उपयोग कृत्रिम उर्वरकों के उत्पादन में किया जाता
है.
जीवाश्म ईंधन :
जीवाश्म ईंधन से
तात्पर्य उन ईंधनों से हैं, जो पेड़-पौधों और जावनरों के अवशेषों के धरती के अंदर
लाखों वर्षों तक दबे रहने के फलस्वरूप बनते हैं. इन ईंधनों में ऊर्जा से भरपूर
कार्बन के यौगिक विद्दमान रहते हैं. कोयले, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस आदि जीवाश्म
ईंधन के प्रमुख उदाहरण हैं.
कोयला :
कोयला पृथ्वी के
अंदर व्यापक रूप से पाया जाने वाला जिवाश्मीय ईंधन है. कोयला को खनिज कोयला भी कहा
जाता है. इसमें 60-90% मुक्त कार्बन तथा उसके यौगिक के अतिरिक्त नाइट्रोजन, गंधक
लोहा आदि के यौगिक भी उपस्थित रहते हैं. कोयला मुख्यतः 4 प्रकार के होते हैं –
पीट, लिग्नाईट बिटुमिनस और एन्थ्रासाईट. पीट कोयले निर्माण की प्रथम अवस्था होती
है. एन्थ्रासाइट सर्वोत्तम किस्म का कोयला होता है, जबकि बिटुमिनस कोयले के
सामान्य किस्म है. संसार का अधिकाँश कोयला बिटुमिनस किस्म का होता है. लिग्नाईट को
भूरा कोयला कहा जाता है. एन्थ्रासाइट कोयले की अंतिम अवस्था होती है. एन्थ्रासाईट
कोयला जलने पर धुआं नहींदेता है और काफी ऊष्मा उत्पन्न होता है.बिटुमिनस कोयला
इंजन में जलाने तथा कोल गैस बनाने में काम आता है. वायु की अनुपस्थिति में कोयले
को गर्म करने पर कोक, अलकतरा और कोल गैस प्राप्त होते हैं. इस प्रक्रियाको कोयले
का भंजक स्रवण कहते हैं. कोयले का उपयोग बायलरो, इंजनों और भट्ठियों में ईंधन के
रूप में, कोल गैस बनाने में, धातुकर्म में अवकारक के रूप में तथा कई रासायनिक
पदार्थों के निर्माण में किया जाता है.
पेट्रोलियम
:
पेट्रोलियम भूरेकाले रंग का तैलीय द्रव होता है,
जिसमें एक विशेष प्रकार की गंध होती है. यह वस्तुतः कई हाइड्रोकार्बन (ठोस, द्रव
और गैसीय) एवं गंधक का मिश्रण होता है. कच्चा पेट्रोलियम का प्रभाजी आसवन या स्रवण
द्वारा शोधन करने पर यह हाइड्रोकार्बन के कई भागों में अलग-अलग हो जाता है. एक
प्रभाजक स्तंभ में इन अवयवों को उनके क्वथनांक बिन्दु पर अलग-अलग कर लिया जाता है. कच्चा पेट्रोलियम के प्रभाजी आसवन या
स्रावण द्वारा निम्नलिखित प्रदार्थ प्राप्त होता हैं – ऐफाल्ट स्नेहक तेल, पैराफिन
मोम, ईंधन तेल, डीजल तेल, मिट्टी का तेल, पेट्रोल, पेट्रोलियम गैस आदि है.
ईंधन तेल का उपयोग मुख्यतः
उद्दोगों के बायलरों और भट्टियों को गर्म करने
में किया जाता है. यह कोयले से उत्तम किस्म का ईंधन होता हैं. इसका पूर्ण दहन होता
है, अत: जलने के पश्चातराख नहीं बनता है. पेट्रोल और डीजल का उपयोग स्वचालित
वाहनों और इंजनों में किया जाता है. किरासन तेल का उपयोग स्वचालित वाहनों और
इंजनों में किया जाता है. किरासन तेल का उपयोग घरों में प्रकाश उत्पन्न करने हेतु
लालटेन और इंजनों में किया जाता है. इसका उपयोग स्टोव जलाने में भी होता है.पेट्रोलियम गैस इथेन, प्रोपेन और ब्युटेन का
मिश्रण होता है. इसका मुख्य अवयव नार्मल एवं आइसो ब्यूटेन आसानी से द्रवीभूत हो
जाता है. अत: द्रव रूप में इसे सिलिंडर में भरकर द्रवित पेट्रोलियम गैस के नाम से
जलावन के लिए उपभोक्ता को दिया जाता है.
ईंधन का ऊष्मीय मान :
किसी ईंधन का ऊष्मीय मान ऊष्मा की वह मात्रा है,
जो उस ईंधन के एक ग्राम को वायु या ऑक्सीजन में पूर्णत: जलाने के पश्चात प्राप्त
होती है. उत्पन्न ऊष्मा को कैलोरी किलो कैलोरी या जूल के पदों में व्यक्त किया
जाता है. किसी भी अच्छे ईंधन का उष्मीय मान अधिक होना चाहिए. सभी ईंधनों में
हाइड्रोजन का ऊष्मीय मान सबसे अधिक होता है, लेकिन इसका उपयोग घरेलू या औद्दोगिक
ईंधन के रूप में सामान्यत: नहीं किया जाता है, क्योंकि इसका सुरक्षित भण्डारण कठिन
होता है. इसका उपयोग अन्तरिक्ष यानों में तथा उच्च ताप उत्पन्न करने वाले ज्वलकों
में किया जाता है. हाइड्रोकार्बन को भविष्य का ईधन कहा जाता है.ज्वलन ताप : जिस न्यूनतम ताप पर कोई पदार्थ जलना
शुरू करता है, उसे उस पदार्थ का ज्वलन ताप कहते हैं.
दहन – किसी पदार्थ के ऑक्सीजन में जलने पर ऊष्म
और प्रकाश उत्पन्न होते हैं. जलने की इस क्रिया को दहन कहते हैं दूसरे
शब्दों में दहन वह रासायनिक अभिक्रिया है, जिसमें ऊष्मा और प्रकाश उत्पन्न होते
हैं तथा उत्पन्न ऊष्मा अभिक्रिया को चालू रखने के लिए पर्याप्त होती है. दहन एक
ऑक्सीकरण क्रिया है.
दहन शील या ज्वलन शील पदार्थ – वे पदार्थ जो जलते
हैं, दहनशील या ज्वलनशील पदार्थ कहलाते हैं, जैसे – कार्बन, गंधक, मोमबत्ती,
मैंग्निशियम आदि.
अदहन शील या अज्वलनशील पदार्थ – वे पदार्थ जो
नहीं जलते हैं, अदहनशील पदार्थ कहलाते हैं जैसे बालू, पत्थर, ईंट, मिट्टी आदि.
दहन के पोषक – जो पदार्थ दहन की क्रिया में सहायक
होते हैं, उन्हें दहन का पोषक कहते हैं, जैसे – ऑक्सीजन
दहन के अपोषक – जो पदार्थ दहन की क्रिया में
सहायक नहीं होते हैं, उन्हें दहन का अपोषक कहते हैं, जैसे – कार्बन
डाईऑक्साइड
नोट: सभी दहन ऑक्सीकरण क्रिया होती है, लेकिन सभी ऑक्सीकरण क्रियाएँ दहन
नहीं होती है.
दहन के लिए आवश्यक शर्ते – दहन की क्रिया के लिए निम्नलिखित तीन शर्ते आवश्यक हैं – दहनशील
पदार्थ की उपस्थिति, दहन के पोषक पदार्थों की उपस्थिति और ज्वलन ताप की प्राप्ति
दहन के प्रकार :
a. द्रुत
दहन – दहन की वह क्रिया जिसमें ऊष्मा एवं प्रकाश अल्प समय में उत्पन्न होते
हैं, द्रुत दहन कहलाता है, जैसे माचिली की तीली का जलना
b. मंद दहन – दहन की वह क्रिया जो बहुत धीरे-धीरे संपादित
होती है, मंद दहन कहलाता है. श्वसन मंद दहन का अच्छा उदहारण
c. स्वत: दहन की वह क्रिया जो बाहरी दाब या प्रहार के प्रभाव
से होती है, बिस्फोटक कहलाता है, जैसे बम का फूटना या पटाखा फूटना
रॉकेट ईंधन – राकेट ईंधन को प्रणोदक कहते हैं. राकेट के
प्रणोदक के लिए प्रणोदक ऊर्जा प्रदान करते हैं. प्रणोदक वैसे ईंधन हैं, जिनके जलने
पर अत्यधिक मात्रा में गैसें एवं ऊर्जा उत्पन्न होती है, तथा इनका दहन बहुत तीव्र गति से होता है एवं दहन के
पश्चात कोई अवशेष नहीं बचता है. प्रणोदक के दहन के फलस्वरूप उत्पन्न गैसें रॉकेट
के पिछले भाग से जेट के रूप में बहुत तीव्र गति से बाहर निकलती है, जिससे राकेट का
ईच्छित दिशा में प्रणोदक होता है.
प्रणोदक दो प्रकार के होते हैं : 1. ठोस प्रणोदक और 2. द्रव प्रणोदक – जैसे
एल्कोहाल, द्रव हाइड्रोजन, द्रव अमोनिया, किरोसिन, हाइड्राजीन आदि द्रव प्रणोदक के
प्रमुख उदाहरण हैं.
बायो गैस : - जानवरों और पेड़-पौधों से प्राप्त व्यर्थ
पदार्थ सूक्ष्म जीवों द्वारा जल की उपस्थिति में आसानी से सड़ते हैं और इस प्रक्रिया
में मीथेन, कार्बन डाईऑक्साइड, हाइड्रोजन, हाइड्रोजन सल्फाइड आदि गैसें निकलती है.
इस गैसीय मिश्रण को बायो गैसे कहते हैं. इसमें लगभग 65% मीथेन होता है. यह
एक उत्तम गैसीय ईंधन हैं. बायो गैस जलने पर धुआं उत्पन्न नहीं करता है, साथ ही साथ
इसके जलने से पर्याप्त ऊष्मा प्राप्त होती है. इसे घरेलू उपयोग में लाने के लिए
किसी प्रकार की असुविधा नहीं होती है. बायो गैस की समाप्ति के पश्चात संयंत्र में
अवशिष्ट पदार्थ में नाइट्रोजन एवं फास्फोरस के कई यौगिक रहते हैं. अत: अवशिष्ट
पदार्थ का उपयोग उर्वरक के रूप में करते हैं. अत; बायो गैस काफी उपयोगी गैस है.