ब्रिटिश भारत में आर्थिक व्यवस्था I GK I Most Important Questions Answers All Exams


  

ब्रिटिश भारत में आर्थिक व्यवस्था 

  1.            दादाभाई नौरोजी ने 1865 डब्ल्यू. सी. बनर्जी के साथ मिलकर लन्दन इण्डिया सोसाईटी का गठन किया. जिसका कार्य भारत के दुःख दर्दों का प्रचार करना था. 
    2.            ब्रिटिश काल में कृषि भूमि का स्वामित्व व्यक्ति कृषक, जमींदार और ग्राम समुदाय सभी को था. 
    3.            स्थाई या इस्तमरारी बन्दोस्त के अंतर्गत व्यक्तिगत कृषक, जमींदार और ग्राम समुदाय सभी को था. 
    4.            स्थाई या इस्तमरारी बन्दोस्त के अंतर्गत जमींदारों को प्रति वर्ष लगाना जमा करना पड़ता था. 
    5.            किसानों के साथ व्यक्तिगत लगान समझौता रैयतवाड़ी कहा गया. 
    6.            महालवाडी व्यस्था में राजस्य व्यवस्था प्रत्येक महाल के साथ स्थापित की गई, कृषक के साथ नहीं. 
    7.            1857 के विद्रोह के ठीक बाद बंगाल में नील विद्रोह हुआ. सन्यासी विद्रोह 1763-1800 में; संथाल विद्रोह – 1855-66 में तथा पाबना उपद्रव-1873-76 में हुआ जबकि नील विद्रोह की शुरुआत बंगाल के नदिया जिले के गोविंदपुर गाँव से हुई एक नील उत्पादक के दो भूतपूर्व कर्मचारियों-दिगम्बर विश्वास तथा विष्णु विश्वास के नेतृत्व में वहाँ के किसान एकजुट हुए तथा उन्होंने नील की खेती बन्द कर दी. यह नील आन्दोलन के इतिहास में अपनी मांगों को लेकर किए गए आंदोलनों में सर्वाधिक व्यापक और जुझारू विद्रोह था. बंगाल का नील विद्रोह शोषण के विरुद्ध किसानों की सीधी लड़ाई थी. बंगाल के वे काश्तकार जो अपने खेतों में चावल की खेती करना चाहते थे, उन्हें यूरोपीय नील बागान मालिक नील की खेती करने के लिए मजबूर करते थे. नील की खेती से इन्कार करने वाली किसानों को नील बागान मालिकों के दमन-चक्र का सामना करना पड़ता था. 
    8.            1993 में कार्नवालिस ने भू-राजस्व की स्थायी बन्दोस्त प्रणाली का पारंभ किया, इसे इस्तमरी, जागीदार, मालगुजारी एवं बीसवेदारी आदि भिन्न-भिन्न नामों से भी जाना जाता है. यह व्यवस्था बंगाल, बिहार, उड़ीसा तथा उत्तर प्रदेश के वाराणसी एवं उत्तरी कर्नाटक में लागू थी. इसके अंतर्गत समूचे ब्रिटिश भारत के क्षेत्रफल का लगभग 19 प्रतिशत हिस्सा शामिल था. इस व्यवस्था के अंतर्गत जमींदारों के एक नए वर्ग को भू-स्वामी घोषित कर दिया गया जिसे भूमि के लगान का 10/11 भाग कंपनी को देना था तथा 1/11 भाग अपनी सेवाओं के लिए अपने पास रखना था. स्थायी बंदोबस्त के अंतर्गत जमींदार छोटे पूंजीपति (भद्र नवाब) थे. जमींदारों को जमींदारी और जोत के उप आवंटन तथा बंटवारा करने का अधिकार प्राप्त हो जाने से भूमि पाने के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ी तथा जमींदारों और काश्तकारों के बीच किराया वसूल करने वाले बिचौलिए की एक लंबी श्रृंखला का उदय हुआ. इस व्यवस्था के अंतर्गत काश्तकारों की स्थिति किराया अदा करने वाले पट्टीदार या असामियों की भांति थी, जिन्हें जमींदारों की दया पर निर्भर रहना पड़ता था. 
    9.            स्थायी भूमि बन्दोस्त या जमींदारी प्रथा के बाद अंग्रेजों प्रथा के बाद अंग्रेजों द्वारा भारत में भूराजस्व वसूली हेतु लागू की गई दूसरी व्यवस्था रैयतवाड़ी व्यवस्था थी. इस व्यवस्था के जन्मदाता टामस मुनरो और कैप्टन रीड थे. जिन्होंने सर्वप्रथम इसे तमिलनाडु के बारामहल जिले में लागू किया. तत्पश्चात यह व्यवस्था मद्रास, बंबई के कुछ हिस्से, पूर्वी बंगाल, असम तथा कुर्ग (आधुनिक कर्नाटक के एक भाग) में लागू की गई. इस प्रथा के अंतर्गत रैयतों को भूमि के मालिकाना और कब्जदारी अधिकार दिए गए थे और ये प्रत्यक्ष रूप से या सीधे था व्यक्तिगत रूप से स्वयं सरकार को भू-राजस्व का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी थे. इस व्यवस्था के कृषक भू-स्वामित्व की स्थापना की. इसके अंतर्गत कुल ब्रिटिश भारत के भू-क्षेत्र का 51 प्रतिशत हिस्सा शामिल था. इस व्यवस्था के अंतर्गत लगान की वसूली कठोरता से की जाती थी और लगान की दर भी काफी ऊँची थी, जिसका परिणाम यह हुआ कि कृषक महाजनों के चंगुल में फंसता चला गया जो कालान्तर में महाजन और किसानों के मध्य संघर्ष का कारण बना. 
10.            कार्नवालिस ने 1793 में स्थायी बन्दोस्त व्यवस्था लागू की. यह व्यवस्था बंगाल, बिहार, उड़ीसा तथा उत्तर प्रदेश के वाराणसी और उत्तरी कर्नाटक के क्षेत्रों में लागू थी. इसके तहत जमींदार, जिन्हें भू-स्वामी के रूप में मान्यता प्राप्त थी, कोअपने क्षेत्रों में भू-राजस्व की वसूली करउसका 1/11 वां हिस्सा अपने पास रखना होता था और शेष हिस्सा कंपनी के पास जमा करना होता था. इस तरह अंग्रेजों का समर्थन करने वालेएक कुलीनतंत्र का निर्माण हुआ. 
11.            स्थायी बन्दोस्त में ब्रिटिश भारत का 19% क्षेत्र आता था. 
12.            जॉन शोर जामीन्दारों को भूमि का स्वामी स्वीकार करता था और उसके अनुसार वे ही लगान देने के वास्तविक अधिकारी थे. 
13.            जेम्स ग्रांट का विचार था की समस्त भूमि सरकार की है तथा जमीदार इसके कर संग्रहकर्ता से अधिक नहीं है. 
14.            आल इण्डिया स्पिनर्स एसोशिएशन’ की स्थापना 1925 ई. में महात्मा गाँधी ने किया जिसका उद्देश्य गाँव में हथकरघा उद्दोग को पुनर्जीवित करना था. 
15.            गाँधी ने ‘आल इण्डिया विलेज इंडस्ट्री एसोसिएशन’ बनाई. इसका उद्देश्य समस्त कुटीर उद्दोग का विकास था. 
16.            के.टी. तैलंग और फिरोजशाह मेहता ने 1870 में बंबई में साबुन का कारखना खोला. 
17.            मैक्लागन समिति ने सहकारी संस्थाओं से संबंधित मिद्दों पर रिपोर्ट पेश की. 
18.            1772 ई. में पंचाशाला (पंचवर्षीय) बन्दोस्त की शुरुआत बंगाल के गवर्नर वारेन हेस्टिंग्स ने किया. उच्चतम बोली लगाने को लगान वसूली का अधिकार दिया गया. पंचशाला बन्दोस्त खत्म होने पर 1777 ई. में कलकत्ता में सुप्रीम कोर्ट की स्थापना की गई. 
19.            बर्क ने हेस्टिंग्स को ‘चूहा और नेवला’, ‘एक झूठा बैलों का ठेकेदार’ और ‘अन्याय का मुखिया’ इत्यादि संज्ञाओं से संबंधित किया. 
20.            भारत में सर्वप्रथम हड़ताल बंबई की ‘टेक्सटाइल मिल’ में 1874 ई. में हुई. तीन वर्ष उपरांत ‘इंप्रेस मिल्स’ नागपुर के श्रमिकों ने अधिक मजदूरी की मांग की पूर्ति न होने के फलस्वरूप हड़ताल की. 
21.            1908 ई. में तिलक की गिरफ्तारी के विरोध में बंबई की कपड़ा मीलों के मजदूरों ने हड़ताल किया. यह मजदूरों की पहली राजुनीतिक हड़ताल थी. 
22.            प्रथम कारखाना कानून (1881 ई.) बाल श्रम से संबंधित था. 
23.            दूसरा कारखाना कानून (1891 ई.) स्त्रियों की स्थिति में सुधार से संबंधित था. 
24.            1918 ई. में भारतीय उद्दोग आयोग की अलग से मदन मोहन मालवीय ने रिपोर्ट प्रस्तुत की. 
25.            फासेट समिति ने चुंगी तथा वेतन से संबंधित मुद्दों पर विचार व्यक्त किया. 
26.            स्प्रू सीमित द्वारा मध्यवर्गीय बेकारी की जाँच की गई थी. 
27.            नियेमर समिति ने केन्द्र तथा राज्यों के बीच वित्तीय संबंधों को विषय में सुझाव दिए. 
28.            उत्तर प्रदेश के अवध क्षेत्र का संबंध ताल्लुकदारी (महालवाड़ी) व्यवस्था से था. इसके अंतर्गत राजस्व व्यवस्था प्रत्येक महाल (ताल्लुक) के साथ स्थापित की गई, किसानों के साथ नहीं. 
29.            ताल्लुकदारी (महालवाड़ी) पद्धति का जन्मदाता हाल्ट मैकेंजी था. 
30.            इसके अंतर्गत उ.प्र. मध्य प्रान्त और पंजाब आते थे जो ब्रिटिश बहुत के कुल भू-भाग का 30 प्रतिशत था. 
31.            के. एम. पन्निकर ने 1765 ई. से 1772 ई. के काल को ‘डाकू राज्य’ कहा.
  

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