अधीनस्थ न्यायालय II अधीनस्थ न्यायालय क्या है II जिला न्यायालय क्या है II व्यवहार न्यायालय क्या है II जिला न्यायालय क्या है II न्यायालय के प्रकार

अधीनस्थ न्यायालय II अधीनस्थ न्यायालय क्या है II जिला न्यायालय क्या है II व्यवहार न्यायालय क्या है II जिला न्यायालय क्या है II न्यायालय के प्रकार

अधीनस्थ न्यायालय II अधीनस्थ न्यायालय क्या है II जिला न्यायालय क्या है II व्यवहार न्यायालय क्या है II जिला न्यायालय क्या है II न्यायालय के प्रकार

उच्च न्यायालयों से नीचे के न्यायालयों की अधीनस्थ न्यायालय कहा जाता है. भारतीय संघ के अंतर्गत सभी राज्यों में अधीनस्थ न्यायालयों की व्यवस्था प्राय: समान है. प्रत्येक जिले में जनता को सहज एवं शीघ्र न्याय उपलब्ध कराने के लिए तीन प्रकार के न्यायालय है : दीवानी, फौजदारी और राजस्व.

दीवानी न्यायालय, दीवानी न्यायालय का अर्थ : जिले के दीवाने न्यायालय का प्रधान जिला जज होता है. वह जिले के सभी दीवानी न्यायालयों के बीच कार्यों का बंटवारा करता है और उनका निरिक्षण करता है. सभी अधीनस्थ न्यायालयों की अपील उसके यहाँ होती है. उसके अधीनस्थ वरिष्ठ उपन्यायाधीश, उप-न्यायाधीश तथा मुंसिफ के न्यायालय होते हैं.

फौजदारी न्यायालय, फौजदारी न्यायालय का अर्थ : जिला न्यायाधीश जब फौजदारी मुकदमों पर विचार करता है तब वह सत्र न्यायाधीश कहलाता है. इसके अधीन फौजदारी मुकदमों पर विचार करने के लिए अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, सहायक, सत्र न्यायाधीश, मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी और न्यायिक दंडाधिकारी होते हैं. सत्र न्यायाधीश इसलिए कहते हैं कि एक फौजदारी मुकदमा जब खुलता है तो उसकी सुनवाई समाप्त होने तक बीच में कोई अन्य मुकदमा नहीं सुना जा सकता है.

राजस्व नयायालय, राजस्व न्यायालय क्या है : जिले में राजस्व संबंधी मुकदमों की सुनवाई के लिए न्यायाधीश, सहायक जिलाधीश, अनुमंडलाधिकारी और अंचलाधिकारी होते हैं. जिलाधीश सभी के कार्यों का नीरिक्षण करता है.

भारत में पंचायत की प्राचीन परंपरा है. ये पंच किसी अधिकारी द्वारा नियुक्त नही किए जाते. उन्हें गाँव के लोग निर्वाचित करते हैं. बिहार राज्य के प्रत्येक ग्राम पंचायत में पंचायत में न्यायिक कार्य के लिए एक ग्राम कचहरी.

न्याय के लिए ग्राम कचहरी का गठन किया गया है. इसमें एक सरपंच और 16 पंच निर्वाचित किए जाते हैं. पंचायत के आठ वार्डों से प्रत्येक से दो-दो पंच निर्वाचित किए जाते हैं. पंचों की कार्यावधि 5 वर्षों की होती है. यह ग्राम कचहरी न्याय-पीठों को स्थापित करती है. सरपंच ग्राम कचहरी और उसके न्याय-पीठों का अध्यक्ष होता है. एक उपसरपंच की भी व्यवस्था है जिस मामले में पंच या उपसरपंच या सरपंच का भी व्यक्तिगत रूप से उसका हित  जुड़ा हुआ है उस मामले में वह भाग नही ले सकता है. अत: सुनवाई के बाद फैसले लिखित रूप में दिए जाते हैं. उस पर सभी सदस्यों के हस्ताक्षर रहते हैं. ग्राम कचहरी वैसे ही मामलों की सुनवाई कर सकती है, जिसमें चुराई गई या विवादग्रस्त सपत्ति का मूल्य 500/- रूपए से अधिक नहीं हो. ग्राम कचहरी का न्याय पीठ अधिक से अधिक एक माह का साधारण कारावास एक सौ रूपए का जुर्माना नहीं देने पर 15 दिनों का कारावास दण्ड दे सकता है. यदि कोई फैसले से संतुष्ट न हो तो वह ऊपर को अदालत में अपील कर सकता है. ग्राम कचहरी ग्रामीणों द्वारा लाए गए छोटे-छोटे मुकदमों का फैसले करती है. मुकदमों पर विचार करते समय यह प्रयत्न करती है कि दोनों पक्षों के बीच समझौता हो जाए. पांच मिलकर मुकदमों की सुनवाई करते हैं. और फैसला देते हैं. ग्राम कचहरी में विवाद में फंसे दोनों पक्ष स्वयँ अपनी-अपनी बात कहते हैं. यहाँ किसी वकील की सहायता की जरूरत नहीं होती.

लोक अदालत : 

हमारी जनसंख्या बहुत बड़ी है. इसलिए हमारे यहाँ मुकदमे भी बहुत हैं. मुकदमे की सुनवाई में वर्षो समय लगता है. मुकदमों की संख्या बढ़ती जा रही है. हजारों ऐसे लोग अभी जेलों में हैं जिनके मुकदमों की सुनवाई अभी तक शुरू नहीं हुई है. इन्हें ‘सुनवाई के अधीन कैदी’ कहा जाता है. इसलिए समय और खर्च को कम करके शीघ्र न्याय उपलब्ध कराने के उद्देश्य से लोक समय और खर्च को कम करके शीघ्र न्याय उपलब्ध कराने के उद्देश्य से लोक अदालतों का गठन किया गया है. सामान्यतया जज उसी क्षेत्र में स्वयँ चले जाते हैं जहाँ का मुदकमा रहता है. बहुत सी बातों का पता स्थानीय जाँच में ही चल  जाता है. इसलिए फैसला देने में सुविधा होती है. दिल्ली में 1985 में लोक अदातल में एक ही दिन में 150 मुकदमों का निपटारा हो गया. यदि जज इसी तरह दौरे पर निकलें तो मामलों की सुनवाई जल्दी पूरी की जा सकती हैं.

  


मुख्यमंत्री (chief minister) एवं मंत्रीपरिषद्

मुख्यमंत्री (chief minister) एवं मंत्रीपरिषद्

मुख्यमंत्री (chief minister) एवं मंत्रीपरिषद्

जिस तरह केन्द्र में प्रधान मंत्री और मंत्रीपरिषद् की राय से सरकार चलती है उसी तरह से राज्य में भी सरकार मुख्यमंत्री और उसकी मंत्रीपरिषद् की राय से चलती है. राज्यपाल राज्य का औपचारिक प्रधान है. असल प्रधान मुख्यमंत्री ही होता है. उसकी मंत्रीपरिषद् ही सरकार चलाती है. इसलिए मंत्रीपरिषद् का महत्त्व है.

मंत्रीपरिषद् का गठन :

जिस तरह राष्ट्रपति लोक सभा में बहुमत रखने वाले दल के नेता को प्रधानमंत्री नियुक्त करता है उसी तरह राज्य की विधान सभा में जिस राजनीतिक दल का स्पष्ट बहुमत होता है उसके नेता को राज्यपाल मुख्यमंत्री के पद पर नियुक्त करता है.

फिर मुख्यमंत्री की सिफारिश पर अन्य मंत्री नियुक्त किए जाते हिं. संघीय मंत्री परिषद् की तरह राज्य की मंत्रीपरिषद् में भी तीन स्तर के मंत्री हो सकते हैं. 1. मंत्री 2. राज्य मंत्री 3. उप मंत्री. इन मन्त्रियों की संख्या संविधान में निश्चित है. यह मुख्यमंत्री की इच्छा पर निर्भर है. लेकिन असल में दलगत राजनीति की दृष्टि से यह संख्या घटती-बढ़ती रहती है.

ये मंत्री राज्य के विधान-मंडल के सदस्य होते हैं. यदि कोई बाहरी व्यक्ति मंत्रीपरिषद् का सदस्य हो जाता है तो छह माह के अंदर विधान –मंडल का सदस्य बन जाना पड़ता है. राज्य मन्त्री के स्तर के मंत्री ही किसी विभाग के स्वतंत्र प्रभार में रहते हैं. राज्यपाल को इन मंत्रियों को पदच्युत करने का अधिकार है. लेकिन जब तक उन्हें विधान सभा का विश्वास प्राप्त रहता है, वह इन्हें नहीं हटा सकता. मंत्रीपरिषद् विधान सभा के प्रति अपने कार्यों के लिए उत्तरदायी है, इसलिए जहाँ अविश्वास का प्रस्ताव पारित हुआ कि मंत्रिपरिषद भंग हो जाती है. सामान्यतया मंत्री परिषद् का कार्यकाल विधानसभा की अवधि अर्थात पांच साल का होता है, परन्तु विधान सभा का विश्वास खोने पर अथवा राष्ट्रपति शासन लागू होने पर मंत्रीपरिषद् पहले भी विघटित हो सकती है. बीच में भी मुख्यमंत्री की अनुशंसा पर मंत्री परिषद् के साद्स्यों में अथवा उनके विभाग में हरे-फेर किए जाते हैं.

प्रत्येक मंत्री को पदग्रहण करने के पहले राज्यपाल इन्हें अपने पद तथा गोपनीयता की शपथ दिलाता है. विधानमंडल को ही इनके वेतन तथा भत्ते आदि तय करने का अधिकार है.

कार्य : मंत्रीपरिषद् के कार्यों को निम्नलिखित वर्गों में बांटा जा सकता है:

1.   प्रशासकीय कार्य,

2.   विधायी कार्य,

3.   आर्थिक कार्य,

4.   विविध कार्य.

 

1. मंत्रीपरिषद् राज्य का शासन चलाती है. वह शासन संबंधी नीतियों को निर्धारित करती है. प्रशासन पर नियंत्रण रखती है और विभिन्न विभागों के बीच समन्वय स्थापित करती है. राज्य में शान्ति एवं विधि व्यवस्था बनाए रखने का उत्तरदायित्व मंत्रीपरिषद् पर है. मंत्री परिषद् के परामर्श पर ही राज्यपाल द्वारा विभिन्न नियुक्तियां की जाती है.

 

2. मंत्रीपरिषद् के परामर्श पर राज्य विधान मंडल की बैठक बुलाई जाती है. विधायिका के सत्र की तारीख और कार्यक्रम मंत्री परिषद् के द्वारा तय किए जाते हैं. मंत्रीपरिषद् विधेयक का प्रारूप तैयार कराती है. विधान मंडल में उसे मंत्री पेश करते हैं. उस पर उठाए गए प्रश्नों का उत्तर देते हैं. विधान मंडल द्वारा पारित किए जाने पर राज्यपाल उसे लागू करता हैं. मंत्रीपरिषद् के सदस्य विधान मंडल की बैठकों में अपने अपने विभाग का प्रतिनिधित्व करते हैं एवं प्रश्नों का उत्तर देते हैं. अविश्वास प्रस्ताव का मंजन करते हिं. आलोचनाओं क सामना करते हुए उसका समुचित प्रतिवाद करते हैं.

 

3.  राज्य सरकार की आर्थिक नीतियाँ एवं कार्यक्रम मंत्रीपरिषद् द्वारा निर्धारित होते हैं. राज्य का वित्तमंत्री विधानसभा में वार्षिक बजट पेश करता है, कटौती के प्रस्तावों का उत्तर देता है और उसे पारित करवाता है. पंचवर्षीय योजना तैयार करने के हेतु नीति निर्धारित करने का काम मंत्री परिषद् ही करती है. आर्थिक सहायता की प्राप्ति के हेतु मंत्रीपरिषद् संघ सरकार से आग्रह करती है.

 

4. राज्यपाल अपनी न्यायिक शक्तियों का प्रयोग मंत्रिपरिषद की राय से करता है. राज्यपाल राज्य के विभिन्न न्यायिक शक्तियों का प्रयोग मंत्रीपरिषद् की राय से करता है. राज्यपाल राज्य के विभिन्न विश्वविदयालयों का कुलाधिपति होता हिया. कुलाधिपति का कार्य साधारणत: मंत्रीपरिषद् की राय के अनुसार होता है. मंत्री परिषद् केन्द्र सरकार और जनता, दोनों से संपर्क बनाए. रखती है. एक तरफ उसके सदस्य सरकारी नीतियों से लोगों को अवगत कराते रहते हैं, ताकि जनमानस सरकार के पक्ष में बना रहे. दूसरे तरफ केन्द्र सरकार से वे संपर्क रखकर राज्य के विकास कार्यों में केन्द्र सरकार की सहायता लेते रहते हैं.

 

मुख्यमंत्री :

राज्यपाल राज्य की विधान सभा में स्पष्ट बहुमत प्राप्त दल अथवा बहुमत प्राप्त संयुक्त दलों के नेता को मुख्यमंत्री के पद पर नियुक्त करता है. संविधान ने संसदीय प्रणाली की स्थापना की है, इसलिए राज्यपाल राज्य का प्रधान होता है, परन्तु मुख्यमंत्री ही राज्य सरकार का असली प्रधान होता है. वह प्रशानिक सतर पर सर्वोच्च है. मुख्यमंत्री के अधिकार एवं कार्य बहुत व्यापक है. फिर भी निम्नलिखित दृष्टिकोणों से हम उसके अधिकारों एवं कार्यों पर विचार कर सकते हैं:


1.    राज्यपाल के साथ मुख्यमंत्री का संबंध. 

 

2.    मंत्रीपरिषद् का संबंध  

 

3.    विधान मंडल के साथ मुख्यमंत्री का संबंध

 

4.    संघ सरकार के साथ मुख्यमंत्री का संबंध

 

5.    राजनीतिक दलों के साथ मुख्यमंत्री का संबंध

 

1.    संविधान में प्रावधान है कि राज्यपाल मुख्यमंत्री की नियुक्ति करता है और वह राज्यपाल की इच्छा या ख़ुशी से जब तक चाहे उस पद पर बना रह सकता है. लेकिन राज्यों में राज्यपाल की नियुक्ति के पूर्व मुख्यमंत्री की राय ली जाती है. दोनों में अनबन की स्थिति में राज्यपाल उस राज्य से हटा दिया जाता है. इसलिए राज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच परस्पर सौहार्द बना रहना जरूरी है. मुख्यमंत्री अपने मंत्रिमंडल के निर्णय से राज्यपाल को अवगत कराता रहता है. राज्यपाल मुख्यमंत्री से शासन संबंधी कोई भी सूचना मांग सकता है. मुख्यमंत्री राज्यपाल और मंत्रीपरिषद् के बीच संपर्क सूत्र का काम करता है.


2.    मुख्यमंत्री ही अपनी मंत्रीपरिषद् बनाता है. उसकी अनुशंसा पर ही मंत्रियों को नियुक्त किया जाता है, पदच्युत किया जाता है और उनके विभागों का बंटवारा किया जाता है. उसके पदत्याग करते ही पूरी मंत्री परिषद् भंग हो जाती है. वही मंत्रीमंडल की बैठक की अध्यक्षता करता है. उसके सभी निर्णयों में मुख्यमंत्री की अहम भूमिका होती है.


3.    मुख्यमंत्री को विधान सभा के बहुमत दल का विश्वास प्राप्त रहता है. इसलिए वह विधायिका से अपनी सभी नीतियों का अनुमोदन करा सकता है. वह विधान सभा को राज्यपाल द्वारा विघटित करा सकता है. विधान सभा अविश्वास प्रस्ताव पास कर मुख्यमंत्री को हटा सकती है.


4.    मुख्यमंत्री ही राज्य सरकार की ओर से संघ सरकार से पत्राचार करता है. मुख्या मंत्री ही राज्य सरकार की समस्याओं के निदान में केन्द्र के साथ पहल कर सकता है. संघ सरकार से वह राज्य के लिए अधिकाधिक आर्थिक सहायता प्राप्त करने की चेष्टा करता है. वह मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में तथा राष्ट्रीय विकास परिषद की बैठकों में भाग लेता है.


5.    वह राज्य में अपने दल का सर्वमान्य नेता होता है. अपने दल के राष्ट्रीय स्तर के नेता से भी उसका अच्छा संपर्क नेता होता है. अपने दल के राष्ट्रीय स्तर के नेता से भी उसका अच्छा संपर्क रहता है. वह राज्य के जनमत को अपने दल के पक्ष में बनाए रखने की कोशिश करता है साथ ही विरोधी दलों से अपने को ऊपर रखने का प्रयास करता रहता है.


कानून का लागू होना II कार्यपालिका न्यायपालिका व्यवस्थापिका II कार्यपालिका नोट्स II कार्यपालिका का अध्यक्ष II कार्यपालिका के अंग II राज्यपाल के कार्य एवं शक्तियां II राज्यपाल के अधिकार II राज्यपाल की भूमिका क्या है II राज्यपाल के कार्य एवं शक्तियां

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राज्य की कार्यकापालिका

राज्य की कार्यपालिका के घटक हैं :- राज्यपाल, मुख्यमंत्री और उसकी मंत्रीपरिषद् और राज्य स्तर की लोक-सेवा में नियुक्त अधिकारी एवं कर्मचारी गण.

राज्यपाल :

संविधान में राज्यपाल को राज्य का प्रधान माना गया है. लेकिन विशेष परिस्थिति में, एक से अधिक राज्य एक ही राज्यपाल के अधीन रखे जा सकते हैं.

नियुक्ति :

राष्ट्रपति द्वारा राज्यपाल की नियुक्ति पाँच वर्षो के लिए की जाती है. वह राष्ट्रपति द्वारा पदच्युत भी किया जा सकता है. राज्यपाल वही हो सकता है, जो भारत का नागरिक हो. 35 वर्ष से कम आयु का न हो. वह सरकार के अधीन कोई लाभ वाला पद धारण नहीं करता हो. यदि ऐसा कोई व्यक्ति जो विधान मंडल या संसद का सदस्य हो और राज्यपाल के पद पर नियुक्त हो जाए तो उसे संसद अथवा विधान-मंडल की सदस्यता छोड़ देनी पड़ती है. किसी राज्य के निवासी को साधारणत: उसी राज्य का राज्यपाल नहीं बनाया जाता है, क्योंकि उसके निष्पक्ष होकर कार्य करने में बाधा आ सकती है. राज्यपाल की नियुक्ति के पूर्व संबंधित राज्य के मुख्यमंत्री के दृष्टिकोण से राष्ट्रपति अवगत हो लिया करते हैं. राज्यपाल का पद धारण करते समय राज्यपाल को उस राज्य के उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधिपति अथवा उसकी अनुपस्थिति में वरीयता न्यायाधिपति के समक्ष संविधान और अपने दायित्व की रक्षा की शपथ लेनी पड़ती है. राज्यपाल का एक राज्य से दूसरे राज्य में स्थानान्तरण भी होता है. राज्यपाल राज्य में संविधानिक पद्धति का प्रहरी है. साथ ही वह केन्द्र तथा राज्य के बीच संबंध बनाए रखने वाला मुख्य संयोजक है. वह राज्य में केन्द्र का प्रतिनिधि प्रहरी और सचेतक होता है.

शक्तियां :

राज्य पाल की शक्तियों का निम्नलिखित वर्गों में विभाजन किया जा सकता है : -

1.  कार्यपालिका शक्तियां

2.  विधायिका शक्तियां

3.  वित्तीय शक्तियां

4.  न्यायिक शक्तियां

5.  विविध

1.                        राज्यपाल राज्य का प्रधान कार्यपालक होता है. राज्य का शासन उसी के नाम से होता है. वह मुख्यमंत्री, अन्य मन्त्रियों, महाधिवक्ता, राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष तथा सदस्य एवं विभिन्न आयोगों के सदस्यों की नियुक्ति करता है.इन्हें वह पदच्युत भी कर सकता है. मुख्यमंत्री से शासन व्यवस्था संबंधी रिपोर्ट मांगने का उसे अधिकार है. राज्य की स्थिति के संबंध में वह राष्ट्रपति को रिपोर्ट भेजता रहता है. राज्य में राष्ट्रपति शासन उसी की रिपोर्ट पर लागू होता है. वैसी अवस्था में वह राज्य का प्रभावकारी शासक हो जाता है. असम, नागालैंड, मणिपुर, आन्ध्र प्रदेश और सिक्किम के राज्यपालों को कुछ विषयों में अपने विवेक से कार्य करने की शक्तियां प्राप्त हैं.

2.                        राज्यपाल के विधान –मंडल का अभिन्न अंग है. वही उसमें भाषण दे सकता है. वह उसे अपना संदेश भेज सकता है. वह विधान सभा को भंग कर सकता है. विधान मंडल द्वारा पारित विधेयक उसकी स्वीकृति पर ही अधिनियम बनते हैं. कुछ विधेयकों को राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के लिए उसे प्रेषित करना होता है. उसे आवश्यकतानुसार, जब विधान सभा का सत्र नहीं चल रहा हो, अध्यादेश लागू करने का अधिकार है. कुछ राज्यों में विधान परिषद् होती है. विधान परिषद् के 1/6 सदस्यों को विज्ञान, साहित्य कला, सहकारिता और समाजसेवा के आधार पर मनोनीत करने का अधिकार उसे प्राप्त है. अगर विधान सभा में भी सदस्यों को मनोनीत कर सकता है. आम चुनावों के बाद विधान मंडल के प्रथम अधिवेशन का प्रारंभ राज्यपाल के अभिभाषण से होता है.

3.                        राज्यपाल विधान सभा में वित्तमंत्री द्वारा बजट पेश करवाता है. आकस्मिक खर्च के लिए राज्य की संचित निधि से राशि स्वीकृत करने का उसे अधिकार है. विधान सभा में पूरक मांग प्रस्तुत करवा सकता है. धन विधेयक को विधान सभा में प्रस्तुत किए जाने के पहले राज्यपाल की अनुमति आवश्यक है.

4.                        वह किसी अभियुक्त की सजा को क्षमा कर सकता है, उसे कम कर सकता है. वह सजा स्थगित भी कर सकता है. अथवा बदल सकता है. उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों (न्यायधिपतियों) की नियुक्ति के समय राज्यपाल से सलाह ली जाती है. जिला जज तथा अन्य न्यायिक पदाधिकारियों की नियुक्ति, पदस्थापन और स्थानान्तरण तय करने का भी उसे अधिकार है.

5.                        राज्यपाल को अपने राज्य के संबंध में राष्ट्रपति को पाक्षिक प्रतिवेदन भेजना पड़ता है. प्रत्येक वर्ष दिल्ली में राज्यपाल सम्मेलन होता है. उसमें भाग लेकर वह केन्द्र सरकार को राज्य की परिस्थितियों एवं आवश्यकताओं से अवगत कराता है. राज्य के विश्वविद्यालयों को वह कुलाधिपति होता है.वह विश्विद्यालयों के कुलपतियों को नियुक्त कर सकता है अथवा उन्हें पदच्युत कर सकता है. वह विभिन्न गैर-राजनीतिक सभाओं तथा सम्मेलनों को संबोधित कर सकता है. राज्यपाल निर्दलीय व्यक्तित्व है.

राज्य पाल की वस्तविक स्थिति :

राज्यपाल की वास्तविक स्थिति का विश्लेषण तीन रूपों में किया जा सकता हैं :-

1.  औपचारिक प्रधान के रूप में

2.  संघ सरकार के एजेन्ट के रूप में और

3.  केन्द्र और राज्य के बीच कड़ी के रूप में

1.                        राज्य में संसदीय सरकार है इसलिए राज्यपाल को औपचारिक  प्रधान की तरह कार्य करना पड़ता है. उसे मंत्रणा और सहायता देने के लिए एक मंत्रीपरिषद् होती है. वही उसके सभी अधिकारों का प्रयोग करती है. विधान सभा में स्पष्ट बहुमत दल के नेता की वह उपेक्षा नहीं कर सकता. ऐसे ही व्यक्ति को उसे मुख्यमंत्री नियुक्त करना पड़ता है. फिर मुख्यमंत्री की सिफारिश पर ही वह अन्य मंत्रियों की नियुक्ति कर सकता है.

लेकिन जब विधान सभा में किसी दल का स्पष्ट बहुमत न हो तब राज्यपाल की शक्ति का पता चलता है. मुख्यमंत्री की नियुक्ति में उस समय वह विवेक का प्रयोग कर सकता है. राष्ट्रपति को प्रेषित पाक्षिक रिपोर्ट भी वह स्वतंत्र रूप से तैयार करता है. राज्य में संवैधानिक तंत्र की विफलता के संबंध में वह अपनी स्वतंत्र रिपोर्ट राष्ट्रपति को भेजता है. वह मंत्रिपरिषद को सलाह दे सकता है.

2.                        राज्यपाल राज्य में केन्द्र का प्रतिनिधित्व होता है. राष्ट्रपति द्वारा उसकी नियुक्ति का प्रयोजन भी यही है. वह संघ सरकार का विश्वासपात्र होता है. वह राज्य में संघ सरकार का प्रहरी होता है. केन्द्र के निर्देशन को राज्य में लागू करना उसका दायित्व है. अगर विधान सभा में किसी राजनीतिक दल का स्पष्ट बहुमत न हो तो मुख्यमंत्री की नियुक्ति में वह केन्द्र द्वारा निर्देशित होकर कार्य कर सकता है. राज्य में राष्ट्रपति शासन उसकी सिफारिश पर लागू होता है. राष्ट्रपति शासन लागू होने पर वह केन्द्रीय एजेन्ट के रूप में वास्तविक शासक बन जाता है. सामान्य आपातकाल की उद्घोषणा होने पर भी उसे केन्द्र के निर्देश का पालन करना पड़ता है.

3.                        राज्य के औपचारिक प्रधान तथा केन्द्र के अभिकर्ता के रूप में कार्य करने के अलावा कड़ी का काम करता है. केन्द्र और राज्य के अनेक प्रकार के आर्थिक और राजनीतिक संबंध रहते हैं. उन्हें सामन्य एवं सौहार्द्रपर्ण बनाए रखने के लिए यह पद बहुत ही उपयोगी है.

जब केन्द्र और राज्यों में दो परस्पर विरोधी दल सत्तारूढ़ हो जाते हैं तो वैसी अवस्था में राज्यपाल की स्थिति बहुत नाजुक हो जाती है. उसके दायित्व बढ़ जाते हैं. उसे औपचारिक प्रधान तथा संघीय अभिकर्ता के दायित्वों के बीच सन्तुलन स्थापित करना पड़ता है. राज्य के आर्थिक स्रोत भारत संघ की अपेक्षा सीमित हैं. राज्य अपनी विकास योजनाओं को केन्द्रीय आर्थिक मदद के बिना पूरा नहीं कर सकता है. ऐसी स्थिति में राज्यपाल, संघ सरकार का व्यक्ति होने के कारण केन्द्र को प्रभावित कर राज्य को अधिक आर्थिक सहायता दिलवाने में समर्थ हो सकता है. इस प्रकार, केन्द्र राज्य संबंध तथा राष्ट्र की एकता को सुदृढ़ बनाए रखने में राज्यपाल की भूमिका महत्वपूर्ण है.

  


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देश का प्रधान राष्ट्रपति होता है. उसी प्रकार राज्य का प्रधान राज्यपाल होता है. प्रधानमंत्री तथा राज्य-स्तर पर मुख्यमंत्री के बारे में तुम रोज अख़बारों में पढ़ते हो. इन लोगों का काम क्या है? उन्हें कौन चुनता है या नियुक्त करता है, इन सबकी जानकारी भारतीय संविधान से मिलते है. हर सरकार की तरह भारत सरकार के भी तीन अंग हैं – विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका. विधायिका कानून बनाती है. भारत में इसे संसद कहते हैं, जो पूरे देश के लिए कानून बनाती है. इसके दो सदन है – लोक सभा और राज्य सभा. जो शाखा कानूनों को कार्य रूप देती है, उसे कार्यपालिका कहते हैं. इसके अंतर्गत राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद होती है. जो अंग कानून के अनुसार झगड़ों का निपटारा कराती है, वह न्यायपालिका कहलाती है, जिसके अंतर्गत उच्चतम न्यायालय उच्च न्यायालय आते हैं. भारतीय संविधान इन सब विषयों की भी जानकारी देता है.

संविधान का अर्थ : sanvidhan ke arth

भारतीय संविधान में उपर्युक्त तीनों अंगों के अधिकार और कार्य का वर्णन किया गया है. इस तरह कहा जा सकता है कि संविधान नियमों का संकलन है, जिसके आधार पर देश का शासन संचालित होता है. संविधान में राष्ट्रीय लक्ष्य, लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, समाजवाद का समावेश है. इसकी पूर्ति के लिए संविधान में सरकार बनाने की योजना है. साथ ही इसमें हमारे अधिकार और कर्तव्य का भी उल्लेख है. अतएव संविधान हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है और हमारा कर्तव्य है कि इसका समुचित आदर करें.

भारतीय जनता के प्रतिनिधियों ने बहुत वाद-विवाद एवं चर्चा के पश्चात् इस संविधान का निर्माण किया. 15 अगस्त, 1947 को हमारा देश स्वतंत्र हुआ, जिसके लिए देशवासियों को ब्रिटिश सरकार से एक लंबेअरसे तक संघर्ष करना पड़ा. इस स्वतंत्रता आन्दोलन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस सबसे आगे थे. इस आन्दोलन का नेतृत्व महात्मा गाँधी, जवाहर लाल नेहरू, मौलाना अबुल कलाम आजाद और अन्य नेताओं ने किया. इस दल में अलग-अलग समुदाय के लोग शामिल थे.कुछ दूसरे राजनीतिक दल भी थे, जैसे मुस्लिम लीग, जिसका नेतृत्व मोहम्मद अली जिन्ना कर रहे थे. वे मुसलमानों के लिए अलग राज्य पाकिस्तान चाहते थे उनका सोचना था कि भारत को आजादी मिलने पर वहाँ हिन्दू बहुमत का वर्चस्व रहेगा और मुसलमानों के प्रति भेदभाव बरता जाएगा. कांग्रेस पाकिस्तान की मांग से सहमत नहीं थी. उसका ख्याल था कि भारत देश हिन्दू, मुसलमान, सिक्ख, ईसाई और दूसरे बहुत से समुदायों को मिलाकर बना है. वे सब मिलकर एक राष्ट्र और देश का निर्माण करते हैं. कांग्रेस पार्टी सभी –समुदायों के हितों का प्रतिनिधित्व करती है.

1939 में दूसरा विश्व-युद्ध शुरू हुआ. महात्मा गाँधी ने इस लड़ाई में सरकार को साथ देने से इंकार किया और राष्ट्रीय स्वाधीनता संघर्ष को तेज किया. ऐसी स्थिति में ब्रिटिश सरकार ने भारतीय स्वंतत्रता संबंधी प्रश्न का हल निकालने के लिए एक शिष्टमंडल को भारत भेजा, जिसमें ब्रिटेन के मंत्रीमंडल के तीन सदस्य थे. यह शिष्टमंडल कैबिनेट मिशन के नाम से प्रसिद्ध है.

कैबिनेट मिशन ने अनुशंसा की कि भारत के संविधान की रचना के लिए संविधान सभा हो. संविधान सभा वह सभा है, जो अपने देश के लिए संविधान बनाती है.मिशन की सिफारिशों के आलोक में जुलाई, 1946 ई. में भारतीय संविधान सभा के गठन के लिए चुनाव हुआ. सदस्यों का चुनाव प्रांतीय सभाओं के सदस्यों के द्वारा किया गया, न कि सीधा जनता के द्वारा. 10 लाख की जनसंख्या पर एक प्रतिनिधि के आधार पर सदस्यों की संख्या निर्धारित हुई. कुल सदस्यों की संख्या 389 थीं, जिसमें अधिकांश सदस्य कांग्रेस पार्टी के थे. पाकिस्तान बनने के पूर्व भी लीग के सदस्यों ने संविधान सभा की पहली बैठक, जो 9 दिसम्बर, 1946 ई. को आयोजित हुई थी, उसका बहिष्कार किया. 1947 में पाकिस्तान की स्थापना हुई. अतएव मुस्लिम लीग के सदस्य पाकिस्तान चले गए यानी संविधान सभा के सदस्यों की संख्या 308 रह गई.

उक्त बैठक में भारत के विभिन्न क्षेत्रों एवं समुदायों के सदस्यों थे. विभिन्न राजनीतिक दलों का प्रतिनिधित्व करने वाले सदस्य भी थे. देश के अच्छे विधि विशेषज्ञ भी सभा में रखे गए थे. पंडित जवाहर लाल नेहरू डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, सरदार बल्लभ भाई पटेल, मौलाना अबुल कलाम आजाद, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी तथा सरदार बलदेव सिंह जैसे ख्याति-प्राप्त महत्वपूर्ण नेता ने भी संविधान सभा की चर्चाओं का दिशा-निर्देशन किया. 30, से अधिक सदस्य अनुसूचित जातियों के थे और अल्पसंख्यक वर्ग, जैसे – ऐंग्लो इडियन और पारसियों का प्रतिनिधित्व क्रमशः श्री फ्रैंक एन्थनी और डॉ. एच. पी. मोदी ने किया. श्री अल्लादि  कृष्ण स्वामी अय्यर, डॉ. बी. आर. आंबेडकर तथा श्री के. एम. मुंशी जैसे क़ानूनी विशेषज्ञ भी सभा के सदस्य थे. महिला सदस्य के रूप में श्रीमती सरोजनी नायडू और श्रीमती विजया लक्ष्मी पंडित थीं. प्रारंभ में संविधानसभा ने डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को सभापति चुना. संविधान का प्रारंभ करने के लिए डॉ. बी.आर. आंबेडकर के सभापतित्व में प्रारूप समिति गठित की गई, जिसके अन्य प्रमुख सदस्य श्री एन. गोपाल स्वामी आयंगर श्री अल्लादि कृष्णा स्वामी अय्यर श्री के. एम. मुंशी और श्री सैयद मोहम्मद सादुल्ला थे.

इस काम को पूरा करने में करीब तीन साल लगे और उक्त अवधि में 6.4 करोड़ रूपए खर्च हुए. सभा के सभी अधिवेशन जनता एवं पत्रकारों के लिए खुले थे. आम लोगों को अपने दृष्टिकोण और विचारों को समाचार-पत्रों के माध्यम से प्रकट करने की छूट थी. इस प्रकार संविधान के निर्माण में परोक्ष रूप से देश की जनता भी शामिल थी.

26 नवंबर, 1949 ई. को संविधान पारित कर दिया गया था. परन्तु यह 26 जनवरी 1950 ई. से लागू हुआ. चूँकि, दिसंबर, 1929 ई. के अपने लाहौर अधिवेशन में कांग्रेस ने भारत की पूर्ण स्वतंत्रता के संघर्ष का निर्णय लिया था और 26 जनवरी, 1930 ई. को पूर्ण स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया जाता था. यही वह कारण है कि हमारे नेताओं ने संविधान को अमल में लाने के लिए 26 जनवरी, 1950 ई. का  दिन चुना. इसी दिन भारत को गणतंत्र घोषित किया गया, तब से हम प्रत्येक 26 जवनरी को गणतंत्र दिवस के रूप में मनाते हैं. 1947 ई. में जब भारत आजाद हुआ, उस समय लार्ड माउंट बैटन भारत के गवर्नर जेनरल थे. उसके बाद पहला भारतीय गवर्नर जेनरल श्री सी. राजगोपालचारी बने. 1950 ई. में संविधान के लागू होने पर डॉ. राजेन्द्र प्रसाद 1952 ई. में देश के पहले निर्वाचित राष्ट्रपति बने. इस प्रकार स्वतंत्र भारत ने अपना संविधान बनाया.