कानून का लागू होना II कार्यपालिका न्यायपालिका व्यवस्थापिका II कार्यपालिका नोट्स II कार्यपालिका का अध्यक्ष II कार्यपालिका के अंग II राज्यपाल के कार्य एवं शक्तियां II राज्यपाल के अधिकार II राज्यपाल की भूमिका क्या है II राज्यपाल के कार्य एवं शक्तियां

कानून का लागू होना II कार्यपालिका न्यायपालिका व्यवस्थापिका II कार्यपालिका नोट्स II कार्यपालिका का अध्यक्ष II कार्यपालिका के अंग II राज्यपाल के कार्य एवं शक्तियां II राज्यपाल के अधिकार II राज्यपाल की भूमिका क्या है II राज्यपाल के कार्य एवं शक्तियां

 

राज्य की कार्यकापालिका

राज्य की कार्यपालिका के घटक हैं :- राज्यपाल, मुख्यमंत्री और उसकी मंत्रीपरिषद् और राज्य स्तर की लोक-सेवा में नियुक्त अधिकारी एवं कर्मचारी गण.

राज्यपाल :

संविधान में राज्यपाल को राज्य का प्रधान माना गया है. लेकिन विशेष परिस्थिति में, एक से अधिक राज्य एक ही राज्यपाल के अधीन रखे जा सकते हैं.

नियुक्ति :

राष्ट्रपति द्वारा राज्यपाल की नियुक्ति पाँच वर्षो के लिए की जाती है. वह राष्ट्रपति द्वारा पदच्युत भी किया जा सकता है. राज्यपाल वही हो सकता है, जो भारत का नागरिक हो. 35 वर्ष से कम आयु का न हो. वह सरकार के अधीन कोई लाभ वाला पद धारण नहीं करता हो. यदि ऐसा कोई व्यक्ति जो विधान मंडल या संसद का सदस्य हो और राज्यपाल के पद पर नियुक्त हो जाए तो उसे संसद अथवा विधान-मंडल की सदस्यता छोड़ देनी पड़ती है. किसी राज्य के निवासी को साधारणत: उसी राज्य का राज्यपाल नहीं बनाया जाता है, क्योंकि उसके निष्पक्ष होकर कार्य करने में बाधा आ सकती है. राज्यपाल की नियुक्ति के पूर्व संबंधित राज्य के मुख्यमंत्री के दृष्टिकोण से राष्ट्रपति अवगत हो लिया करते हैं. राज्यपाल का पद धारण करते समय राज्यपाल को उस राज्य के उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधिपति अथवा उसकी अनुपस्थिति में वरीयता न्यायाधिपति के समक्ष संविधान और अपने दायित्व की रक्षा की शपथ लेनी पड़ती है. राज्यपाल का एक राज्य से दूसरे राज्य में स्थानान्तरण भी होता है. राज्यपाल राज्य में संविधानिक पद्धति का प्रहरी है. साथ ही वह केन्द्र तथा राज्य के बीच संबंध बनाए रखने वाला मुख्य संयोजक है. वह राज्य में केन्द्र का प्रतिनिधि प्रहरी और सचेतक होता है.

शक्तियां :

राज्य पाल की शक्तियों का निम्नलिखित वर्गों में विभाजन किया जा सकता है : -

1.  कार्यपालिका शक्तियां

2.  विधायिका शक्तियां

3.  वित्तीय शक्तियां

4.  न्यायिक शक्तियां

5.  विविध

1.                        राज्यपाल राज्य का प्रधान कार्यपालक होता है. राज्य का शासन उसी के नाम से होता है. वह मुख्यमंत्री, अन्य मन्त्रियों, महाधिवक्ता, राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष तथा सदस्य एवं विभिन्न आयोगों के सदस्यों की नियुक्ति करता है.इन्हें वह पदच्युत भी कर सकता है. मुख्यमंत्री से शासन व्यवस्था संबंधी रिपोर्ट मांगने का उसे अधिकार है. राज्य की स्थिति के संबंध में वह राष्ट्रपति को रिपोर्ट भेजता रहता है. राज्य में राष्ट्रपति शासन उसी की रिपोर्ट पर लागू होता है. वैसी अवस्था में वह राज्य का प्रभावकारी शासक हो जाता है. असम, नागालैंड, मणिपुर, आन्ध्र प्रदेश और सिक्किम के राज्यपालों को कुछ विषयों में अपने विवेक से कार्य करने की शक्तियां प्राप्त हैं.

2.                        राज्यपाल के विधान –मंडल का अभिन्न अंग है. वही उसमें भाषण दे सकता है. वह उसे अपना संदेश भेज सकता है. वह विधान सभा को भंग कर सकता है. विधान मंडल द्वारा पारित विधेयक उसकी स्वीकृति पर ही अधिनियम बनते हैं. कुछ विधेयकों को राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के लिए उसे प्रेषित करना होता है. उसे आवश्यकतानुसार, जब विधान सभा का सत्र नहीं चल रहा हो, अध्यादेश लागू करने का अधिकार है. कुछ राज्यों में विधान परिषद् होती है. विधान परिषद् के 1/6 सदस्यों को विज्ञान, साहित्य कला, सहकारिता और समाजसेवा के आधार पर मनोनीत करने का अधिकार उसे प्राप्त है. अगर विधान सभा में भी सदस्यों को मनोनीत कर सकता है. आम चुनावों के बाद विधान मंडल के प्रथम अधिवेशन का प्रारंभ राज्यपाल के अभिभाषण से होता है.

3.                        राज्यपाल विधान सभा में वित्तमंत्री द्वारा बजट पेश करवाता है. आकस्मिक खर्च के लिए राज्य की संचित निधि से राशि स्वीकृत करने का उसे अधिकार है. विधान सभा में पूरक मांग प्रस्तुत करवा सकता है. धन विधेयक को विधान सभा में प्रस्तुत किए जाने के पहले राज्यपाल की अनुमति आवश्यक है.

4.                        वह किसी अभियुक्त की सजा को क्षमा कर सकता है, उसे कम कर सकता है. वह सजा स्थगित भी कर सकता है. अथवा बदल सकता है. उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों (न्यायधिपतियों) की नियुक्ति के समय राज्यपाल से सलाह ली जाती है. जिला जज तथा अन्य न्यायिक पदाधिकारियों की नियुक्ति, पदस्थापन और स्थानान्तरण तय करने का भी उसे अधिकार है.

5.                        राज्यपाल को अपने राज्य के संबंध में राष्ट्रपति को पाक्षिक प्रतिवेदन भेजना पड़ता है. प्रत्येक वर्ष दिल्ली में राज्यपाल सम्मेलन होता है. उसमें भाग लेकर वह केन्द्र सरकार को राज्य की परिस्थितियों एवं आवश्यकताओं से अवगत कराता है. राज्य के विश्वविद्यालयों को वह कुलाधिपति होता है.वह विश्विद्यालयों के कुलपतियों को नियुक्त कर सकता है अथवा उन्हें पदच्युत कर सकता है. वह विभिन्न गैर-राजनीतिक सभाओं तथा सम्मेलनों को संबोधित कर सकता है. राज्यपाल निर्दलीय व्यक्तित्व है.

राज्य पाल की वस्तविक स्थिति :

राज्यपाल की वास्तविक स्थिति का विश्लेषण तीन रूपों में किया जा सकता हैं :-

1.  औपचारिक प्रधान के रूप में

2.  संघ सरकार के एजेन्ट के रूप में और

3.  केन्द्र और राज्य के बीच कड़ी के रूप में

1.                        राज्य में संसदीय सरकार है इसलिए राज्यपाल को औपचारिक  प्रधान की तरह कार्य करना पड़ता है. उसे मंत्रणा और सहायता देने के लिए एक मंत्रीपरिषद् होती है. वही उसके सभी अधिकारों का प्रयोग करती है. विधान सभा में स्पष्ट बहुमत दल के नेता की वह उपेक्षा नहीं कर सकता. ऐसे ही व्यक्ति को उसे मुख्यमंत्री नियुक्त करना पड़ता है. फिर मुख्यमंत्री की सिफारिश पर ही वह अन्य मंत्रियों की नियुक्ति कर सकता है.

लेकिन जब विधान सभा में किसी दल का स्पष्ट बहुमत न हो तब राज्यपाल की शक्ति का पता चलता है. मुख्यमंत्री की नियुक्ति में उस समय वह विवेक का प्रयोग कर सकता है. राष्ट्रपति को प्रेषित पाक्षिक रिपोर्ट भी वह स्वतंत्र रूप से तैयार करता है. राज्य में संवैधानिक तंत्र की विफलता के संबंध में वह अपनी स्वतंत्र रिपोर्ट राष्ट्रपति को भेजता है. वह मंत्रिपरिषद को सलाह दे सकता है.

2.                        राज्यपाल राज्य में केन्द्र का प्रतिनिधित्व होता है. राष्ट्रपति द्वारा उसकी नियुक्ति का प्रयोजन भी यही है. वह संघ सरकार का विश्वासपात्र होता है. वह राज्य में संघ सरकार का प्रहरी होता है. केन्द्र के निर्देशन को राज्य में लागू करना उसका दायित्व है. अगर विधान सभा में किसी राजनीतिक दल का स्पष्ट बहुमत न हो तो मुख्यमंत्री की नियुक्ति में वह केन्द्र द्वारा निर्देशित होकर कार्य कर सकता है. राज्य में राष्ट्रपति शासन उसकी सिफारिश पर लागू होता है. राष्ट्रपति शासन लागू होने पर वह केन्द्रीय एजेन्ट के रूप में वास्तविक शासक बन जाता है. सामान्य आपातकाल की उद्घोषणा होने पर भी उसे केन्द्र के निर्देश का पालन करना पड़ता है.

3.                        राज्य के औपचारिक प्रधान तथा केन्द्र के अभिकर्ता के रूप में कार्य करने के अलावा कड़ी का काम करता है. केन्द्र और राज्य के अनेक प्रकार के आर्थिक और राजनीतिक संबंध रहते हैं. उन्हें सामन्य एवं सौहार्द्रपर्ण बनाए रखने के लिए यह पद बहुत ही उपयोगी है.

जब केन्द्र और राज्यों में दो परस्पर विरोधी दल सत्तारूढ़ हो जाते हैं तो वैसी अवस्था में राज्यपाल की स्थिति बहुत नाजुक हो जाती है. उसके दायित्व बढ़ जाते हैं. उसे औपचारिक प्रधान तथा संघीय अभिकर्ता के दायित्वों के बीच सन्तुलन स्थापित करना पड़ता है. राज्य के आर्थिक स्रोत भारत संघ की अपेक्षा सीमित हैं. राज्य अपनी विकास योजनाओं को केन्द्रीय आर्थिक मदद के बिना पूरा नहीं कर सकता है. ऐसी स्थिति में राज्यपाल, संघ सरकार का व्यक्ति होने के कारण केन्द्र को प्रभावित कर राज्य को अधिक आर्थिक सहायता दिलवाने में समर्थ हो सकता है. इस प्रकार, केन्द्र राज्य संबंध तथा राष्ट्र की एकता को सुदृढ़ बनाए रखने में राज्यपाल की भूमिका महत्वपूर्ण है.

  


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