मुख्यमंत्री (chief minister) एवं मंत्रीपरिषद्
जिस तरह केन्द्र में प्रधान मंत्री और
मंत्रीपरिषद् की राय से सरकार चलती है उसी तरह से राज्य में भी सरकार मुख्यमंत्री
और उसकी मंत्रीपरिषद् की राय से चलती है. राज्यपाल राज्य का औपचारिक प्रधान है.
असल प्रधान मुख्यमंत्री ही होता है. उसकी मंत्रीपरिषद् ही सरकार चलाती है. इसलिए
मंत्रीपरिषद् का महत्त्व है.
मंत्रीपरिषद् का गठन :
जिस तरह राष्ट्रपति लोक सभा में बहुमत रखने वाले
दल के नेता को प्रधानमंत्री नियुक्त करता है उसी तरह राज्य की विधान सभा में जिस
राजनीतिक दल का स्पष्ट बहुमत होता है उसके नेता को राज्यपाल मुख्यमंत्री के पद पर
नियुक्त करता है.
फिर मुख्यमंत्री की सिफारिश पर अन्य मंत्री
नियुक्त किए जाते हिं. संघीय मंत्री परिषद् की तरह राज्य की मंत्रीपरिषद् में भी
तीन स्तर के मंत्री हो सकते हैं. 1. मंत्री 2. राज्य मंत्री 3. उप मंत्री. इन
मन्त्रियों की संख्या संविधान में निश्चित है. यह मुख्यमंत्री की इच्छा पर निर्भर
है. लेकिन असल में दलगत राजनीति की दृष्टि से यह संख्या घटती-बढ़ती रहती है.
ये मंत्री राज्य के विधान-मंडल के सदस्य होते
हैं. यदि कोई बाहरी व्यक्ति मंत्रीपरिषद् का सदस्य हो जाता है तो छह माह के अंदर
विधान –मंडल का सदस्य बन जाना पड़ता है. राज्य मन्त्री के स्तर के मंत्री ही किसी
विभाग के स्वतंत्र प्रभार में रहते हैं. राज्यपाल को इन मंत्रियों को पदच्युत करने
का अधिकार है. लेकिन जब तक उन्हें विधान सभा का विश्वास प्राप्त रहता है, वह
इन्हें नहीं हटा सकता. मंत्रीपरिषद् विधान सभा के प्रति अपने कार्यों के लिए
उत्तरदायी है, इसलिए जहाँ अविश्वास का प्रस्ताव पारित हुआ कि मंत्रिपरिषद भंग हो
जाती है. सामान्यतया मंत्री परिषद् का कार्यकाल विधानसभा की अवधि अर्थात पांच साल
का होता है, परन्तु विधान सभा का विश्वास खोने पर अथवा राष्ट्रपति शासन लागू होने
पर मंत्रीपरिषद् पहले भी विघटित हो सकती है. बीच में भी मुख्यमंत्री की अनुशंसा पर
मंत्री परिषद् के साद्स्यों में अथवा उनके विभाग में हरे-फेर किए जाते हैं.
प्रत्येक मंत्री को पदग्रहण करने के पहले
राज्यपाल इन्हें अपने पद तथा गोपनीयता की शपथ दिलाता है. विधानमंडल को ही इनके
वेतन तथा भत्ते आदि तय करने का अधिकार है.
कार्य : मंत्रीपरिषद् के कार्यों को निम्नलिखित वर्गों में बांटा जा सकता है:
1. प्रशासकीय कार्य,
2. विधायी कार्य,
3. आर्थिक कार्य,
4. विविध कार्य.
1. मंत्रीपरिषद् राज्य का शासन चलाती है. वह शासन संबंधी नीतियों को निर्धारित करती है. प्रशासन पर नियंत्रण रखती है और विभिन्न विभागों के बीच समन्वय स्थापित करती है. राज्य में शान्ति एवं विधि व्यवस्था बनाए रखने का उत्तरदायित्व मंत्रीपरिषद् पर है. मंत्री परिषद् के परामर्श पर ही राज्यपाल द्वारा विभिन्न नियुक्तियां की जाती है.
2. मंत्रीपरिषद् के परामर्श पर राज्य विधान मंडल की बैठक बुलाई जाती है. विधायिका के सत्र की तारीख और कार्यक्रम मंत्री परिषद् के द्वारा तय किए जाते हैं. मंत्रीपरिषद् विधेयक का प्रारूप तैयार कराती है. विधान मंडल में उसे मंत्री पेश करते हैं. उस पर उठाए गए प्रश्नों का उत्तर देते हैं. विधान मंडल द्वारा पारित किए जाने पर राज्यपाल उसे लागू करता हैं. मंत्रीपरिषद् के सदस्य विधान मंडल की बैठकों में अपने अपने विभाग का प्रतिनिधित्व करते हैं एवं प्रश्नों का उत्तर देते हैं. अविश्वास प्रस्ताव का मंजन करते हिं. आलोचनाओं क सामना करते हुए उसका समुचित प्रतिवाद करते हैं.
3. राज्य सरकार की आर्थिक नीतियाँ एवं कार्यक्रम मंत्रीपरिषद् द्वारा निर्धारित होते हैं. राज्य का वित्तमंत्री विधानसभा में वार्षिक बजट पेश करता है, कटौती के प्रस्तावों का उत्तर देता है और उसे पारित करवाता है. पंचवर्षीय योजना तैयार करने के हेतु नीति निर्धारित करने का काम मंत्री परिषद् ही करती है. आर्थिक सहायता की प्राप्ति के हेतु मंत्रीपरिषद् संघ सरकार से आग्रह करती है.
4. राज्यपाल अपनी न्यायिक शक्तियों का प्रयोग मंत्रिपरिषद की राय से करता है. राज्यपाल राज्य के विभिन्न न्यायिक शक्तियों का प्रयोग मंत्रीपरिषद् की राय से करता है. राज्यपाल राज्य के विभिन्न विश्वविदयालयों का कुलाधिपति होता हिया. कुलाधिपति का कार्य साधारणत: मंत्रीपरिषद् की राय के अनुसार होता है. मंत्री परिषद् केन्द्र सरकार और जनता, दोनों से संपर्क बनाए. रखती है. एक तरफ उसके सदस्य सरकारी नीतियों से लोगों को अवगत कराते रहते हैं, ताकि जनमानस सरकार के पक्ष में बना रहे. दूसरे तरफ केन्द्र सरकार से वे संपर्क रखकर राज्य के विकास कार्यों में केन्द्र सरकार की सहायता लेते रहते हैं.
मुख्यमंत्री :
राज्यपाल राज्य की विधान सभा में स्पष्ट बहुमत
प्राप्त दल अथवा बहुमत प्राप्त संयुक्त दलों के नेता को मुख्यमंत्री के पद
पर नियुक्त करता है. संविधान ने संसदीय प्रणाली की स्थापना की है, इसलिए राज्यपाल
राज्य का प्रधान होता है, परन्तु मुख्यमंत्री ही राज्य सरकार का असली
प्रधान होता है. वह प्रशानिक सतर पर सर्वोच्च है. मुख्यमंत्री के अधिकार एवं कार्य
बहुत व्यापक है. फिर भी निम्नलिखित दृष्टिकोणों से हम उसके अधिकारों एवं कार्यों
पर विचार कर सकते हैं:
1. राज्यपाल के साथ मुख्यमंत्री का संबंध.
2. मंत्रीपरिषद् का संबंध
3. विधान मंडल के साथ मुख्यमंत्री का संबंध
4. संघ सरकार के साथ मुख्यमंत्री का संबंध
5. राजनीतिक दलों के साथ मुख्यमंत्री का संबंध
1. संविधान में प्रावधान है कि
राज्यपाल मुख्यमंत्री की नियुक्ति करता है और वह राज्यपाल की
इच्छा या ख़ुशी से जब तक चाहे उस पद पर बना रह सकता है. लेकिन राज्यों में राज्यपाल
की नियुक्ति के पूर्व मुख्यमंत्री की राय ली जाती है. दोनों में अनबन की
स्थिति में राज्यपाल उस राज्य से हटा दिया जाता है. इसलिए राज्यपाल और मुख्यमंत्री
के बीच परस्पर सौहार्द बना रहना जरूरी है. मुख्यमंत्री अपने मंत्रिमंडल
के निर्णय से राज्यपाल को अवगत कराता रहता है. राज्यपाल मुख्यमंत्री
से शासन संबंधी कोई भी सूचना मांग सकता है. मुख्यमंत्री राज्यपाल और
मंत्रीपरिषद् के बीच संपर्क सूत्र का काम करता है.
2. मुख्यमंत्री ही अपनी मंत्रीपरिषद्
बनाता है. उसकी अनुशंसा पर ही मंत्रियों को नियुक्त किया जाता है, पदच्युत किया
जाता है और उनके विभागों का बंटवारा किया जाता है. उसके पदत्याग करते ही पूरी
मंत्री परिषद् भंग हो जाती है. वही मंत्रीमंडल की बैठक की अध्यक्षता करता है.
उसके सभी निर्णयों में मुख्यमंत्री की अहम भूमिका होती है.
3. मुख्यमंत्री को विधान सभा के
बहुमत दल का विश्वास प्राप्त रहता है. इसलिए वह विधायिका से अपनी सभी नीतियों का
अनुमोदन करा सकता है. वह विधान सभा को राज्यपाल द्वारा विघटित करा सकता है.
विधान सभा अविश्वास प्रस्ताव पास कर मुख्यमंत्री को हटा सकती है.
4. मुख्यमंत्री ही राज्य सरकार
की ओर से संघ सरकार से पत्राचार करता है. मुख्या मंत्री ही राज्य सरकार
की समस्याओं के निदान में केन्द्र के साथ पहल कर सकता है. संघ सरकार से वह राज्य
के लिए अधिकाधिक आर्थिक सहायता प्राप्त करने की चेष्टा करता है. वह मुख्यमंत्रियों
के सम्मेलन में तथा राष्ट्रीय विकास परिषद की बैठकों में भाग
लेता है.
5. वह राज्य में अपने
दल का सर्वमान्य नेता होता है. अपने दल के राष्ट्रीय स्तर के नेता से भी उसका
अच्छा संपर्क नेता होता है. अपने दल के राष्ट्रीय स्तर के नेता से भी उसका
अच्छा संपर्क रहता है. वह राज्य के जनमत को अपने दल के पक्ष में बनाए रखने की
कोशिश करता है साथ ही विरोधी दलों से अपने को ऊपर रखने का प्रयास करता रहता है.