मौलिक अधिकारों का स्थगन II मौलिक अधिकार II मौलिक अधिकार पर निबंध II maulik adhikar in hindi pdf II maulik adhikar in hindi II Fundamental rights in India II Right To Equality II Article 14 of the Constitution of India II मौलिक अधिकार इन हिंदी

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जब राष्ट्रपति अनुच्छेद 352 के अंतर्गत संकटकाल की घोषणा करता है तो संविधान द्वारा अनुच्छेद के 19 के तहत प्रदत्त सभी स्वतंत्रताएँ स्वयं स्थगित हो जाती हैं. संकटकाल में किसी भी कानून अथवा कार्यकारिणी के आदेश को इस आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती कि यह अनुच्छेद 19 द्वारा प्रदत्त अधिकारों के विरुद्ध है. राष्ट्रपति अन्य राष्ट्रपति अन्य अधिकारों को विशिष्ट आदेशों द्वारा स्थगित कर सकता है परन्तु इन आदेशों की पुष्टि संसद द्वारा की जानी आवश्यक है. यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि राष्ट्रपति द्वारा जारी किए गए आदेश समस्त देशा अथवा भारत के किसी भाग में लागू किए जा सकते हैं. मौलिक अधिकारों के स्थगन संबंधी प्रावधानों की कुछ आलोचकों द्वारा कड़ी आलोचना की गई है परन्तु आम राय यह है कि राष्ट्र के हितों को व्यक्ति के हितों पर प्राथमिकता दी जानी चाहिए.

विशिष्ट लक्षण (special features),  मौलिक अधिकार का महत्व, मौलिक अधिकार की विशेषता

भारत के संविधान द्वारा प्रदान किए गए मौलिक अधिकारों के निम्नलिखित विशिष्ट लक्षण है :-

1.    यह अधिकतर साधारण कानून द्वारा प्रदान किए गए अधिकारों की तुलना में अधिक पवित्र हैं क्योंकि यह संविधान द्वारा प्राप्त किए गए हैं. 

2.    यह अधिकार असीमित नहीं हैं तथा उन पर उचित प्रतिबन्ध लगाए जा सकते हैं. 

3.    इन अधिकारों को न्यायिक संरक्षण प्राप्त है तथा उन्हें न्यायालयों के माध्यम से लागू कराया जा सकता है. 

4.    मौलिक अधिकारों को (जिनमें संवैधानिक संरक्षण का अधिकार भी सम्मिलित है) राष्ट्रीय संकट के समय स्थगित किया जा सकता है. 

5.    संविधान द्वारा प्रदान किए गए कुछ अधिकार समाज के कुछ वर्गों को उपलब्ध नहीं हैं. उदारहण के लिए सशस्त्र सेनाओं तथा पुलिस के सदस्यों को राजनैतिक अधिकार उपलब्ध नहीं है. ये अधिकार केवल राज्य के विरुद्ध उपलब्ध नहीं. 

6.    मौलिक अधिकार सकारात्मक तथा नकारात्मक दोनों प्रकार के हैं वे अधिकारों जो नागरिकों को कुछ विशेषाधिकार प्रदान करते हैं सकारात्मक  और नकारात्मक दोनों प्रकार के हैं. वे अधिकार जो नागरिकों को कुछ विशेषाधिकार प्रदान करते हैं. सकारात्मक माने जाते हैं, नागरिक माने जाते हैं.   


राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांत directive principles of state policy II राज्य के नीति निर्देशक तत्व II directive principles of state policy in hindi II  राज्य के नीति निदेशक सिद्धांतों के महत्व क्या है II  directive principles of state policy upsc II Directive Principles

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राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांत directive principles of state policy


राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांत जो संविधान निर्माताओं की महत्वाकांक्षाओं को प्रतिबिंबित करते हैं, संविधान के भाग – IV में दिए गए हैं. इसके अतिरिक्त संविधान के कुछ अन्य अनुच्छेद जैसे कि 335, 350A और 351 भी इन्हीं से संबंधित हैं. नीति निर्देशक सिद्धांतों का मुख्य उद्देश्य लोकतंत्र को वास्तविक बनाने के लिए सामाजिक और आर्थिक आधार प्रादान करना है. इन सिद्धांतों को अदालतों के माध्यम से लागू नहीं कराया जा सकता. यह केवल राज्य को निर्देश के रूप में हैं और नीति निर्धारित करते समय सरकार को इन्हें ध्यान में रखना पड़ता है.
राज्य के नीति निर्देशक सिद्धान्तों और मौलिक अधिकारों, मौलिक अधिकारों और राज्य के नीति निदेशक सिद्धांतों के बीच संबंध, मौलिक अधिकारों और राज्य के नीति निदेशक सिद्धांतों के बीच का अंतर pdf, अधिकार और नीति निर्देशक तत्व में अंतर, मूल अधिकार और नीति निर्देशक तत्व : (difference between directive principles of state policy and fundamental rights) distinguish between directive principles of state policy and fundamental righ :-
राज्य के नीति निर्देशक सिद्धान्तों को निश्चित उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए जारी किए गए सकारात्मक आदेश है परन्तु मौलिक अधिकार प्रशासन को कुछ विशेष कार्य करने से रोकते हैं.
नीति निर्देशक सिद्धांतों को न्यायपालिका के माध्यम से लागू नहीं किया जा सकता है. यदि प्रशासन उनकी अवहेलना अथवा उल्लंघन करता है तो न्यायपालिका कोई कार्यवाही नहीं कर सकती. इसके विपरीत मौलिक अधिकारों को न्यायालय के माध्यम से लागू कराया जस सकता है.
नीति निर्देशक सिद्धांत मौलिक अधिकारों की तुलना में निम्न कोटि के माने जाते हैं. यदि नीति निर्देशक सिद्धान्तों और मौलिक अधिकारों में टकराव हो जाता है तो मौलिक अधिकार अधिक सशक्त माने जाते हैं.
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मुख्य नीति निर्देशक सिद्धांत : important directive principles)
नीति निर्देशक सिद्धान्तों को मुख्यालय निम्न तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है :-

1.  आर्थिक एवं सामाजवादी सिद्धांत (economic and socialist principles) :-


इन सिद्धान्तों का मुख्य उद्देश्य सामजिक और आर्थिक न्याय प्रदान करना व देश में एक कल्याणकारी राज्य की स्थापना करना है. यह सिद्धांत राज्य को आदेश देते हैं कि :
a.     सभी नागरिकों को जीविका के उपयुक्त साधन प्रदान करना. धन तथा उत्पादन के साधनों के केन्द्रीकरण को रोकना और धन का भौतिक साधनों का न्याय संगत बंटवारा करना.
b.     पुरुषों और स्त्रियों दोनों को समान कार्य के लिए समान वेतन दिलाना.
c.      सभी कर्मकारों को शिष्ट जीवनस्तर और अवकाश प्रदान करना.
d.     शिशुओं और युवाओं के शोषण को रोकने और उन्हें आवश्यक अवसर व सुविधाएँ प्रदान कराना

2.   गांधीवादी सिद्धांत (Gandhian principles) :


गाँधीवादी पुनर्निमाण कार्यक्रम के प्रतीक हैं
इसमें शामिल सिद्धांत है:
a.     ग्रामीण पंचायतों के संगठन के लिए कदम उठाना तथा उन्हें स्वायत शासन की इकाइयों के रूप में कार्य करने योग्य बनाना.
b.     समाज के पिछड़े वर्गों के शैक्षिक और आर्थिक हितों को बढ़ावा देना. c.      कुटीर उद्दोगों के विकास को प्रोत्साहन देना
d.     नशीली दवाइयों और शराब इत्यादि के सेवन पर पतिबंध लगाना. गायों और बछड़ों और अन्य दुधारू जीवों के वध को रोकना.

3.   उदारवादी सिद्धांत liberal principles : उदारवाद के प्रमुख सिद्धांतों की विवेचना कीजिए :-


      विचारधारा पर आधारित हैं और निम्न सिद्धान्तों पर बल देते हैं :
a.     भारत के समस्त राज्य क्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान दीवानी सहिता.b.     14 वर्षों की आयु तक सभी बच्चों के लिए अनिवार्य और निशुल्क शिक्षा.
c.      न्यायपालिका और कार्यपालिका का पृथक्करण.d.     आर्थिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों को निशुल्क कानूनी सहायता प्रदान करता ताकि कोई भी नागरिक आर्थिक तथा अन्य अभावों के कारण न्याय पाने से वंचित न रह जाए.
e.     उद्दोगों के प्रबंध में कर्मकारों को भाग देना.
f.       पर्यावरण का संरक्षण और संवर्धन और वन व वन्य जीवों की रक्षाओं.
g.     राष्ट्रीय महत्त्व के संस्मारकों, स्थानों और वस्तुओं का संरक्षण.
h.     विदेशों क्षेत्र में यह सिद्धांत अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति और सुरक्षा, राष्ट्रों के बीच न्यायसंगत और सम्मानपर्ण संबंध बनाएं रखना, अन्तर्राष्ट्रीय कानून और संधि-बाधाओं का पालन और अन्तर्राष्ट्रीय विवादों को मध्यस्थता द्वारा निपटानाइत्यादि.     

  मौलिक कर्त्तव्य (Fundamental Duties) II fundamental duties in hindi II fundamental duties in hindi essay II maulik kartavya in hindi

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  भारत के नागरिकों के कृत्यों का उल्लेख अनुच्छेद 51-A में किया गया है. यह प्रावधान 42वें संशोधन में 1976 में सम्मिलित किए गए. संविधान के अनुसार प्रत्येक नागरिक का यह कत्तर्व्य होगा कि वह :-1.   संविधान का पालन करे और उसके आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रीय गान का आदर करे. 
2.   स्वतंत्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय आन्दोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शों को हृदय में संजोए रखे और उनका पालन करे. 
3.   भारत की प्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा करे. 
4.   देश की रक्षा करे और आह्वान किए जाने पर राष्ट्र की सेवा करे. 
5.   भारत के सभी लोगों में समरसता और समान बन्धुत्व की भावना का निर्माण करे जो धर्म, भाषा और प्रदेश या वर्ग पर आधारित मतभेदों से परे हो, ऐसी प्रथाओं का त्याग करे जो स्त्रियों के सम्मान के विरुद्ध है. 
6.   हमारी मिली-जुली संस्कृति की गौरवशाली परंपरा का महत्त्व समझे और उसका परीक्षण करे. 
7.   प्राकृतिक पर्यावरण की, जिसके अतर्गत वन, झीलें. नदी और वन्य जीव हैं, रक्षा करे और उसका संवर्धन करे तथा प्राणीमात्र के प्रति दया भाव रखे. 
8.   वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवतावाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करे. 
9.   सार्वजनिक संपत्ति को सुरक्षित रखे और हिंसा से दूर रहे. 
10.    व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधियों की सभी क्षेत्रों में
 
   उत्कर्ष की ओर बढ़ने का सतत प्रयास करे जिससे राष्ट्र निरंतर बढ़ते हुए प्रयत्न और उपलब्धि की नई ऊँचाई को छू सके.
यह ध्यान देने योग्य है कि उपरोक्त कर्त्तव्यों को कानून द्वारा लागू कराया जा सकता है तथा संसद इन कर्त्तव्यों और उत्तरदायित्वों को न निभाने के लिए कानून द्वारा दण्ड निश्चित कर सकती है. वास्तव कर्त्तव्यों के संविधान में जोड़े जाने को इसलिए भी उचित ठहराया गया है कि उनसे लोकतंत्र सुदृढ़ हुआ है.
उच्च न्यायालय का अधिकार क्षेत्र (jurisdiction of high court) II उच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र II uchch nyayalay ke kshetradhikar II jurisdiction of high court II uchch nyayalay kshetradhikar II uchch nyayalay ki shaktiyan II power of high court II high court of india

उच्च न्यायालय का अधिकार क्षेत्र (jurisdiction of high court) II उच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र II uchch nyayalay ke kshetradhikar II jurisdiction of high court II uchch nyayalay kshetradhikar II uchch nyayalay ki shaktiyan II power of high court II high court of india


उच्च न्यायालय का अधिकार क्षेत्र (jurisdiction of high court) II उच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र II uchch nyayalay ke kshetradhikar II jurisdiction of high court II uchch nyayalay kshetradhikar II uchch nyayalay ki shaktiyan II power of high court II high court of india II सर्वोच्च न्यायालय के कार्य बताइए II सर्वोच्च न्यायालय का प्रारंभिक क्षेत्राधिकार समझाइए II उच्च न्यायालय के कोई चार क्षेत्र अधिकार का उल्लेख कीजिए 


उच्च न्यायालय की शक्तियां (powers of high court in india),  uchch nyayalay ki shaktiyan इस प्रकार हैं :-


1.   इसे वह सब शक्तियां प्राप्त हैं जो इसे संविधान लागू होने से पूर्व प्राप्त थीं. 
2.   उच्च न्यायालय एक अभिलेख न्यायाल (court of record) है और इसे वह सब अधिकार प्राप्त है जो एक अभिलेख न्यायालय को प्राप्त हैं. इस द्वारा दिए गए निर्णयों का हवाला अन्य मुकदमों में दिया जा सकता है. इसे न्यायालय की मानहानि करने पर दण्ड देने का भी अधिकार है. 
3.   इसे नौसेना विभाग (admirality), court of record in hindi  विवाह से संबंधित मामलों और न्यायपालिका की मानहानि के मामले में सीधे उच्च न्यायालय के पास लाए जा सकते हैं. 
4.   उच्च न्यायालय अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाले व्यक्तियों को निर्देश, आदेश अथवा लेख जारी कर सकता है. मौलिक अधिकारों को लागू करने अथवा अन्य मामलों में उच्च न्यायालय अनेक प्रकार के लेख जारी कर सकता है जैसे कि बन्दी प्रत्यक्षीकरण (habeas corpus), प्रतिषेघ, अधिकार पूछना और उत्प्रेष्ण लेख. 
5.   उच्च न्यायलय अपने आधीन न्यायालयों और अधिकारों पर नियंत्रण रखता है तथा यह सुनिश्चित करता है कि निम्न न्यायालय अपने कर्तव्यों को भली-भांति निभा रहे हैं. 
6.   उच्च न्यायालय चाहे तो किसी भी मामले को, जो निम्न अदालत के विचाराधीन है, अपने हाथ में ले सकता है और उसका निपटारा कर सकता है अथवा उस मामले से जुड़े  हुए क़ानूनी मुद्दे की व्याख्या दे सकता है और उस न्यायालय को आदेश दे सकता है कि उसके निर्णय के अनुरूप उस मामले का निपटारा करे. 
7.   उच्च न्यायालय के आधिकार क्षेत्र संसद और भी विस्तृत बना सकती है. 
उच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र संसद और भी विस्तृत बना सकता है. उच्च न्यायालय की उपरोक्त शक्तियों और अधिकार क्षेत्र से यह स्पष्ट है कि मुख्यतया नियंत्रण करने वाली अदालत है जो निम्न अदालतों तथा अधिकरणों पर नियंत्रण रखती है. यह नागरिकों के मौलिक अधिकारों और स्वतंत्रताओं की भी रक्षा करती है.  

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भारत की संचित निधि (consolidated fund of india)


यह वह निधि है जिसमें सरकार द्वारा अथवा उसकी ओर से प्राप्त सभी राजस्व जमा कराया जाता है. इसके अतिरिक्त नए ऋण पुराने ऋणों की अदायगी इत्यादि से प्राप्त होने वाला धन इत्यादि भी इसी में जमा कराए जाते हैं. इस निधि में से धन केवल संसद की पूर्व अनुमति से खर्च किया जा सकता है. संचितनिधि कोष के विषय में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 266 (1) में वर्णन किया गया है. कुछ खर्चे ऐसे भी हैं जिन्हें संविधान द्वारा संचित निधि पर भारित घोषित किया गया है. यह खर्चे संसद की स्वीकृति के बिना भी संचित निधि से किए जा सकते हैं.

कुछ प्रमुख खर्चे जो संविधान द्वारा संचालित निधि पर भारित घोषित किए गए हैं, इस प्रकार हैं :


1.   रष्ट्रपति का वेतन, भत्ते और उसके दफ्तर से संबंधित खर्चे. 
2.   भारत सरकार द्वारा अदा किए जाने वाले ऋण. 
3.   सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों व न्यायधीशों को दिए जाने वाले वेतन और भत्ते. 
4.   नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक को दिए जाने वाले वेतन, भत्ते और पेंशन इत्यादि. 
5.   कोर्ट द्वारा जारी की गई डिक्री (decree) अथवा निर्णय के फलस्वरूप जमा कराने वाली धन राशि. 
6.   वह अन्य खर्चे जो संविधान अथवा संसद द्वारा संचित निधि पर भारित घोषित किए जाएँ. 

यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि भारत की संचित निधि से कोई भी धन संसद की स्वीकृति के बिना नहीं निकाला जा सकता है.

कृषि के प्रकार (types of agriculture) II types of agriculture in india II types of agriculture in india upsc II agriculture upsc notes II Farming systems in India II types of farming in india II krishi ke prakar

कृषि के प्रकार (types of agriculture) II types of agriculture in india II types of agriculture in india upsc II agriculture upsc notes II Farming systems in India II types of farming in india II krishi ke prakar


कृषि के प्रकार (types of agriculture) II types of agriculture in india II types of agriculture in india upsc II agriculture upsc notes II Farming systems in India II types of farming in india II krishi ke prakar II 


कृषि के प्रकार हिंदी में, गहन कृषि के प्रकार, गहन कृषि की विशेषता, रोपण कृषि की विशेषता, रोपण कृषि की परिभाषा, रोपण कृषि की विशेषताएं, बागानी कृषि की विशेषताएं, बागानी कृषि किसे कहते हैं, स्थानांतरित कृषि की परिभाषा, कृषि कितने प्रकार की होती है :-


1.    स्थानांतरित कृषि – यह मानव की आदिम अवस्था सूचक कृषि है. इसमें सबसे पहले कुल्हाड़ी से वन के किसी खण्ड को साफ करके वृक्षों और झाड़ियों के जला दिया जाता है, उसके बाद कुछ वर्षों तक कृषि की जाती है. भूमि की उर्वरता समाप्त हो जाने पर उसे छोड़कर किसी दूसरी जगह पर यही क्रिया की जाती है. इसे काटना और जलाना अथवा बुश फेलो कृषि भी कहा जाता है. खेतों का आकार छोटा होता है और एक साथ कई फसलों की कृषि की जाती है. 
2.    स्थानबद्ध कृषि – यह स्थानान्तरित कृषि के विपरीत कृषि पद्धति है. यह विश्व में सबसे अधिक की जाने वाली कृषि है, जिसमें एक निश्चित स्थान पर स्थायी रूप से बसकर कृषि की जाती है. 
3.    जीविका कृषि – ऐसी कृषि जो संपूर्ण रूप से खेती करने वाले परिवार या उसी क्षेत्र में खप जाती है, जीविका कृषि कहलाती है. इसके अंतर्गत धान, गेहूँ, दाल, मक्का, ज्वार-बाजरा, गन्ना, सोयाबीन, कंद वाली फसलें, शाक-सब्जी आदि की कृषि की जाती है. 
4.    गहन कृषि – इस प्रकार की खेती में अधिकाधिक उत्पादन प्राप्त करने के उद्देश्य से प्रति इकाई भूमि पर पूंजी और श्रम अधिक मात्रा में लगाया जाता है. गहन कृषि में अधिक मात्रा में रासायनिक उर्वरक, सिचाई, सस्यावर्तन और हरी उर्वरक, अच्छे किस्म के बीज, कीटनाशक, खाद आदि का भरपूर प्रयोग किया जाता है. 
5.    विस्तृत कृषि – यांत्रिक विधियों से काफी विस्तृत आकार वाले खेतों पर की जाने वाली कृषि को विस्तृत कृषि कहा जाता है. इस प्रकार की कृषि में श्रमिकों का प्रयोग कम होता है, किन्तु प्रति व्यक्ति उत्पादन की मात्रा अधिक होती है. पूर्व सोवियत संघ का स्टेपी क्षेत्र, USA का मध्यवर्ती और पश्चिमी मैदानी भाग, कनाडा का प्रेयरी क्षेत्र, अर्जेटीना का पम्पस क्षेत्र और आस्ट्रेलिया का डाउन्स क्षेत्र विस्तृत कृषि के अंतर्गत आता है. 
6.    मिश्रित कृषि – इस प्रकार की कृषि में कृषि में कृषि-कार्यों के साथ-साथ पशुपालन का कार्य भी किया जाता है. संपूर्ण यूरोप महाद्वीप, USA के पूर्वी भाग, द. पू. आस्ट्रेलिया, अर्जेटीना के पम्पास क्षेत्र, द. अफ्रीका और न्यूजीलैंड में मिश्रित कृषि का प्रचलन अधिक पाया जाता है. 
7.    रोपण या बागानी कृषि – यह एक प्रकार की पूर्णत: व्यापारिक उद्देश्यों से की जाने वाली कृषि है, जिसमें नकदी फसलों का उत्पादन किया जाता है. इसके अंतर्गत बड़े-बड़े फार्मो की स्थापना करके कारखानों की भांति किसी के फसल विशेष की कृषि की जाती है. जैसे – रबड़, कोको, कहवा, नारियल, चाय, कपास,पटसन आदि. 
8.    डेयरी फार्मिंग – यह एक प्रकार की विशेषीकृत कृषि है, जिसमें दूध देने वाले पशुओं के प्रजनन एवं उनके पालन पर विशेष ध्यान दिया जाता है. ग्रेट-ब्रिटेन, आयरलैंड, बेल्जियम, डेनमार्क, नीदरलैंड, स्विटजरलैंड, फ़्रांस, उत्तरी अमेरिका में विशाल झील के समीपवर्ती क्षेत्र, द. पू. आस्ट्रेलिया एवं न्यूजीलैंड में डेयरी कृषि विस्तृत पैमाने पर की जाती है. 
9.    ट्रक फार्मिंग – व्यापारिक स्तर पर की जाने वाली सब्जियों एवं फलों-फूलों की कृषि जिसमें परिवहन के लिए ट्रकों का अधिक उपयोग किया जाता है, ट्रक फार्मिंग कहलाता है.