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जनसंख्या वृद्धि एवं विभिन्न राष्ट्रों में अंतर : अठारहवीं सदी
के प्रारंभ में औद्दोगिकक्रान्ति की शुरुआत हुई. रहन-सहन में सुधार होने और
अनेक क्षेत्रों में सूखे और महामारी की घटनाएं कम होने से मनुष्य की जनसंख्या
में वृद्धि होने लगी. बीसवीं सदी के प्रारंभ में विश्व की जनसंख्या 1.6
बिलियन थी, जो सदी के अंत तक 6.1 बिलियन हो गई थी. जनसंख्या में वृद्धि विकसित
देशों की अपेक्षा विकासशील देशों में अधिक देखी गई है.
विभिन्न देशों में जनसंख्या नियंत्रण की दरों में अंतर सांस्कृतिक,
आर्थिक, राजनीतिक और जनसांख्यिकी कारणों कारणों पर निर्भर
है. कुछ देशों के भिन्न-भिन्न भागों में भी अंतर पाया जाता है, जिसका कारण उनकी सामुदायिक
अथवा धार्मिक विचारधारा है. कुछ देशों में परिवार कल्याण
कार्यक्रमों के लिए सरकारी प्रयासों की कमी होना और सभी प्रकार के गर्भनिरोधक
उपायों की सुलभता में कमी होना इत्यादि ऐसी गंभीर बाधाएं हैं, जिनके कारण अनेक
देशों में जनसंख्या वृद्धि को रोक पाना कठिन हो रहा है.
जनसंख्या विस्फोटक और परिवार कल्याण
कार्यक्रम :-जब जन्म दर, मृत्यु दर से अधिक तीव्र होती है या जनसंख्या
में वृद्धि तीव्र गति से होती है, तो उसे जनसंख्या विस्फोटक की
संज्ञा दी जाती हजी. जनसंख्या में होने वाली असाधारण वृद्धि को रोकने के
लिए भारत ने सन् 1951 में पूरी गंभीरता के साथ एक प्रभावी परिवार कल्याण
कार्यक्रम की शुरुआत की. इस कार्यक्रम का उद्देश्य जन्म दर को इस सीमा तक कम करना
था, जिससे कि देश की जनसंख्या को ऐसे स्तर पर सुनिश्चित किया जा सके, जो राष्ट्रीय
अर्थव्यवस्था की आवश्यकता के अनुरूप को ऐसे स्तर पर सुनिश्चित किया जा सके,
जो राष्ट्रीय अर्थव्यस्था की आवश्यकताओं के अनुरूप हो ‘हम दो, हमारे दो’ जैसे नारे
से कहा गया कि प्रत्येक परिवार के दो से अधिक बच्चे नहीं होने चाहिए.
वनस्पतियों के लिए उपयुक्त विधि का फैसला चिकित्सकों
अथवा प्रशिक्षित सामाजिक कार्यकर्ताओं की सलाह पर आधारित
होना चाहिए, जो सभी प्रकार के उपलब्ध तारिकों के बारे में पूरी जानकारी दे सकते
हैं. इसके अतिरिक्त गर्भ निरोध से संबंधित उपायों का प्रचार-प्रसार करना,
बंध्याकरण आदि महत्वपूर्ण है.
पर्यावरण और मानव – स्वास्थ्य : - हमारे स्वास्थ्य
को प्रभावित करने वाले पर्यावरणीय मुद्दे बेहतर पर्यावरण प्रबंध की
आवश्यकता की चेतना बढ़ाने वाले सबसे महत्वपूर्ण कारणों में से एक हैं. स्वच्छ
पर्यावरण मानव जाने-अनजाने में पर्यावरण को प्रभावित/प्रदूषित किया है;
जैसे नगरीकरण और औद्दोगिकरण, किटनाशकों का प्रयोग आदि की
क्रियाओं में वृद्धि, जिससे मानव के स्वास्थ्य पर अनेक बीमारियों; जैसे क्षय
रोग, मलेरिया, जापानी मस्तिष्क ज्वर, लसवाही
फाइलेरिया आदि के रूप में प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है. अत: यह मान्यता सही नहीं
है कि आर्थिक संवृद्धि मानव की प्रगति का अकेला सूचक है.
विश्व स्वस्थ संगठन की परिभाषा : के अनुसार, पर्यावरणीय स्वास्थ्य
में जीवन की गुणवत्ता समेत मानव स्वास्थ्य के वे पक्ष शामिल
हैं, जो पर्यावरण में भौतिक, रासायनिक, जैविक, सामाजिक
और मनोवैज्ञानिक कारकों से निर्धारित होते हैं.
मानवाधिकार : पर्यावरण के अनेक मुद्दों का मानवाधिकारों
से गहरा संबंध है. इनमें पर्यावरणीय संसाधनों क समतामूलक वितरण,
उनका उपयोग और बौद्धिक सम्पदा अधिकार विशेष रूप से संरक्षित क्षेत्रों के आसपास
जनता और वन्यजीवन के बीच का टकराव, बंधों और खदानों जैसी विकास परियोजनाओं से जुड़े
पुनर्वास के प्रश्न और स्वास्थ्य के लिए पर्यावरण से जुड़े रोगों की रोकथाम शामिल
है.
सन् 1946 में मानवाधिकार आयोग का गठन किया
गया. 10 दिसम्बर को विश्व मानवाधिकार दिवस के रूप में मनाया जाता
है.
मूल्य शिक्षा : - मूल्यों का संबंध हमारे अपने उन
सिद्धान्तों व मानदंडों से है, जिनके आधार पर हम यह तय करते हैं कि कौन-सा व्यवहार
सही है और कौन सा लगत है.
ऐसी आशा की जाती है कि पर्यावरण के संदर्भ
में मूल्य शिक्षा एक नई निर्वहनीय जीवन शैली को विकसित करने में सहायक हो सकती है.
बुनियादी तौर पर पर्यावरण संबंधी मूल्यों की शिक्षा नहीं दी जा सकती. इनकी
बोध हमारे पर्यावरण की परिपत्तियों के महत्त्व के समक्ष और पर्यावरणीय के
विनाश से पैदा समस्याओं के अनुभव की एक पेचीदा प्रक्रिया द्वारा पैदा होता है.
महिला और बाल कल्याण महिलाओं
और बच्चों के कल्याण से अनेक पर्यावरणीय कारकों का गहरा संबंध है.
अनुमान है कि दुनिया में हर साल लगभग 1.1 करोड़ महिलाएँ बीमारियों और
पर्याप्त भोजन के अभाव में मृत्यु की शिकार हो जाती हैं. इनमें से अधिकांश
मौतें विकासशील देशों में होती हैं. इसी प्रकार कुछ देशों में हर मौतें में
से सात मौतें पाँच प्रमुख कारणों या उनके किसी संयोग से होती है. ये हैं निमोनिया,
दस्त, खसरा, मलेरिया, और कुपोषण दुनिया में हर चार में से तीन बच्चे इनमें से
कम-से कम एक रोग से ग्रस्त हैं तथा इनमें से अधिकाँश बीमारियाँ आस-पास के
खराब वातावरण से संबन्धित होती है. भारत में महिलाओं और बच्चों के समग्र
विकास के लिए वर्ष 1985 में महिला एवं बाल विकास विभाग की
स्थापना की गई. मंत्रालय के पास छ: स्वायत्त संगठन है, जो अपने तत्वावधान में
कार्यरत है.