अधीनस्थ न्यायालय II अधीनस्थ न्यायालय क्या है II जिला न्यायालय क्या है II व्यवहार न्यायालय क्या है II जिला न्यायालय क्या है II न्यायालय के प्रकार
उच्च न्यायालयों से नीचे के न्यायालयों
की अधीनस्थ न्यायालय कहा जाता है. भारतीय संघ के अंतर्गत सभी
राज्यों में अधीनस्थ न्यायालयों की व्यवस्था प्राय: समान है.
प्रत्येक जिले में जनता को सहज एवं शीघ्र न्याय उपलब्ध कराने के लिए तीन प्रकार
के न्यायालय है : दीवानी, फौजदारी और राजस्व.
दीवानी न्यायालय, दीवानी न्यायालय का अर्थ : जिले के दीवाने न्यायालय का प्रधान जिला जज होता है. वह जिले के सभी दीवानी न्यायालयों के बीच कार्यों का बंटवारा करता है और उनका निरिक्षण करता है. सभी अधीनस्थ न्यायालयों की अपील उसके यहाँ होती है. उसके अधीनस्थ वरिष्ठ उपन्यायाधीश, उप-न्यायाधीश तथा मुंसिफ के न्यायालय होते हैं.
फौजदारी न्यायालय, फौजदारी
न्यायालय का अर्थ : जिला न्यायाधीश जब फौजदारी मुकदमों पर विचार करता है तब वह सत्र
न्यायाधीश कहलाता है. इसके अधीन फौजदारी मुकदमों पर विचार करने के लिए अतिरिक्त
जिला एवं सत्र न्यायाधीश, सहायक, सत्र न्यायाधीश, मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी और
न्यायिक दंडाधिकारी होते हैं. सत्र न्यायाधीश इसलिए कहते हैं कि एक फौजदारी मुकदमा
जब खुलता है तो उसकी सुनवाई समाप्त होने तक बीच में कोई अन्य मुकदमा नहीं सुना जा
सकता है.
राजस्व नयायालय, राजस्व न्यायालय क्या है : जिले में राजस्व संबंधी मुकदमों की सुनवाई के लिए न्यायाधीश, सहायक जिलाधीश, अनुमंडलाधिकारी और अंचलाधिकारी होते हैं. जिलाधीश सभी के कार्यों का नीरिक्षण करता है.
भारत में पंचायत की प्राचीन परंपरा
है. ये पंच किसी अधिकारी द्वारा नियुक्त नही किए जाते. उन्हें गाँव के लोग
निर्वाचित करते हैं. बिहार राज्य के प्रत्येक ग्राम पंचायत
में पंचायत में न्यायिक कार्य के लिए एक ग्राम कचहरी.
न्याय के लिए ग्राम कचहरी का गठन
किया गया है. इसमें एक सरपंच और 16 पंच निर्वाचित किए जाते हैं. पंचायत
के आठ वार्डों से प्रत्येक से दो-दो पंच निर्वाचित किए जाते हैं. पंचों की
कार्यावधि 5 वर्षों की होती है. यह ग्राम कचहरी न्याय-पीठों को
स्थापित करती है. सरपंच ग्राम कचहरी और उसके न्याय-पीठों का
अध्यक्ष होता है. एक उपसरपंच की भी व्यवस्था है जिस मामले में पंच या उपसरपंच
या सरपंच का भी व्यक्तिगत रूप से उसका हित
जुड़ा हुआ है उस मामले में वह भाग नही ले सकता है. अत: सुनवाई के बाद फैसले
लिखित रूप में दिए जाते हैं. उस पर सभी सदस्यों के हस्ताक्षर रहते हैं. ग्राम कचहरी
वैसे ही मामलों की सुनवाई कर सकती है, जिसमें चुराई गई या विवादग्रस्त सपत्ति का
मूल्य 500/- रूपए से अधिक नहीं हो. ग्राम कचहरी का न्याय पीठ अधिक से अधिक एक माह
का साधारण कारावास एक सौ रूपए का जुर्माना नहीं देने पर 15 दिनों का कारावास दण्ड
दे सकता है. यदि कोई फैसले से संतुष्ट न हो तो वह ऊपर को अदालत में अपील कर सकता
है. ग्राम कचहरी ग्रामीणों द्वारा लाए गए छोटे-छोटे मुकदमों का फैसले करती है.
मुकदमों पर विचार करते समय यह प्रयत्न करती है कि दोनों पक्षों के बीच समझौता हो
जाए. पांच मिलकर मुकदमों की सुनवाई करते हैं. और फैसला देते हैं. ग्राम कचहरी में
विवाद में फंसे दोनों पक्ष स्वयँ अपनी-अपनी बात कहते हैं. यहाँ किसी वकील की
सहायता की जरूरत नहीं होती.
लोक अदालत :
हमारी जनसंख्या बहुत बड़ी है. इसलिए हमारे यहाँ
मुकदमे भी बहुत हैं. मुकदमे की सुनवाई में वर्षो समय लगता है. मुकदमों की संख्या
बढ़ती जा रही है. हजारों ऐसे लोग अभी जेलों में हैं जिनके मुकदमों की सुनवाई अभी तक
शुरू नहीं हुई है. इन्हें ‘सुनवाई के अधीन कैदी’ कहा जाता है. इसलिए समय और खर्च
को कम करके शीघ्र न्याय उपलब्ध कराने के उद्देश्य से लोक समय और खर्च को कम करके
शीघ्र न्याय उपलब्ध कराने के उद्देश्य से लोक अदालतों का गठन किया गया है.
सामान्यतया जज उसी क्षेत्र में स्वयँ चले जाते हैं जहाँ का मुदकमा रहता है. बहुत
सी बातों का पता स्थानीय जाँच में ही चल
जाता है. इसलिए फैसला देने में सुविधा होती है. दिल्ली में 1985 में लोक
अदातल में एक ही दिन में 150 मुकदमों का निपटारा हो गया. यदि जज इसी तरह दौरे पर
निकलें तो मामलों की सुनवाई जल्दी पूरी की जा सकती हैं.