प्रधानमंत्री एवं मंत्रीपरिषद II prime minister II mantra mandal ke prakar II mantri mandal ke kary I मंत्रीपरिषद् का गठन II मंत्रियों में सामान्यतया तीन श्रेणियाँ होती हैं II मंत्रियों परिषद् के कार्य

प्रधानमंत्री एवं मंत्रीपरिषद II prime minister II mantra mandal ke prakar II mantri mandal ke kary I मंत्रीपरिषद् का गठन  II मंत्रियों में सामान्यतया तीन श्रेणियाँ होती हैं II मंत्रियों परिषद् के कार्य


मंत्रीपरिषद् का गठन


हमारे संविधान में प्रावधान है कि राष्ट्रपति की सहायता एवं परामर्श देने के लिए एक मंत्रीपरिषद् होगी. उसका प्रमुख प्रधानमन्त्री होता है.

संविधान में प्रावधान है कि राष्ट्रपति ऐसे व्यक्ति को प्रधानमंत्री के रूप में नियुक्त करेगा जिसे लोक सभा में टिकाऊ बहुमत प्राप्त होने की संभावना है. इसलिए सामान्यतया लोकसभा में बहुमत दल के नेता को राष्ट्रपति प्रधानमंत्री के पद पर नियुक्त करता है और प्रधानमंत्री की अनुशंसा पर अन्य मंत्रियों को नियुक्त करता है. ये मंत्री संसद के सदस्य होते हैं. यदि कोइ९ बाहरी व्यक्ति मंत्री – पद पर नियुक्त किया जाता है तो उसे छह माह के भीतर राज्यसभा अथवा लोकसभा का सदस्य बन जाना आवश्यक होगा.


मंत्रीपरिषद् को लोकसभा के प्रति उत्तरदाई रहना पड़ता है. यदि लोकसभा अविश्वास प्रस्ताव पारित कर दे तो मंत्रीपरिषद् भंग हो जाएगी. मंत्री-पद धारण करते समय मंत्रियों को अपने पद एवं गोपनीयता की शपथ लेनी पड़ती है.


मंत्रियों में सामान्यतया तीन श्रेणियाँ होती हैं :-


1.   कैबिनेट स्तर के मंत्री, 

2.   राज्य मंत्री और 

3.   उपमंत्री

 

यही मंत्रीपरिषद् संघ सरकार की वास्तविक कार्यपालिका है. प्रधानमंत्री ही इस मंत्रीपरिषद् का सृजनकर्ता होता है. वह उसकी बैठक की अध्यक्षता करता है. मंत्रियों के बीच विभागों का बंटवारा करके राष्ट्रपति द्वारा उन्हें गोपनीयता एवं संविधान की सुरक्षा की शपथ दिलवाता है. मंत्रीपरिषद् की बैठक सामान्यतया सप्ताह में एक बार होती है.


मंत्री पद के लिए चुने गये व्यक्तियों को राज्यसभा अथवा लोकसभा का सदस्य होना अनिवार्य है. यदि वह व्यक्ति सदस्य नहीं है तो शपथ लेने के छह माह के भीतर उसे निर्वाचित होकर किसी-न-किसी सदन का सदस्य होना अनिवार्य है. इस तरह मंत्री संसद के किसी-न-किसी सदन के सदस्य अवश्य होते हैं. इसका कारण यह है कि मंत्रीपरिषद् लोकसभा के प्रति ही उत्तरदायी है. लोकसभा का विश्वास खोते ही मंत्रीपरिषद् भंग हो जाती है.


भारतीय संघ की मंत्रीपरिषद् में लगभग साठ सदस्य होते हैं. सभी विषयों पर इतनी बड़ी परिषद् नित्य बैठकर निर्णय नहीं ले सकती है, इसलिए कार्य को जल्दी निपटाने की दृष्टि से संघ सरकार के विभाग, विभिन्न, मंत्रियों के जिम्मे सुपुर्द कर दिए जाते हैं. जैसे, रेलमंत्री, रेल विभाग का, कृषिमंत्री, कृषि-विभाग का, शिक्षा-मंत्री, शिक्षा-विभाग का कार्य देखते हैं.


भारत का प्रधानमंत्री लोकसभा का नेता होता है. प्रधानमंत्री के परामर्श पर राष्ट्रपति मंत्रियों को नियुक्त करता है अथवा पदच्युत करता है. इस तरह प्रधानमंत्री ही शासन का प्रधान है. वही कार्यपालिका का वास्तविक प्रधान है. राष्ट्रपति मात्र औपचारिक प्रधान है. वही कार्यपालिका का वास्तविक प्रधान है. मंत्रीपरिषद् के निर्णय के लिए प्रधानमंत्री ही उत्तरदायी है, राष्ट्रपति नहीं. यदि राष्ट्रपति किसी निर्णय से असंतुष्ट है, अथवा असहमत है तो उस विषय पर पुन: विचार करने के लिए मंत्रीपरिषद् से अनुरोध कर सकता है.


इसलिए कभी-कभी यह संदेह व्यक्त किया जाता है कि राष्ट्रपति कार्यपालिका का प्रधान है अथवा प्रधानमंत्री. डॉ. अम्बेदकर, ने जो संविधान समिति के अध्यक्ष थे, राष्ट्रपति के पद की व्याख्या करते हुए, कहा था, राष्ट्रपति का स्थान वहीं है जो अंग्रेजी संविधान में राजा का है. वह राज्य का प्रधान है, कार्यपालिका का नहीं. वह राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करता है, शासन का नहीं.


मंत्रियों परिषद् के कार्य :-


राष्ट्रपति औपचारिक प्रधान है. अत: उसके सभी अधिकारों का प्रयोग मंत्रीपरिषद् ही करता है. मंत्रीपरिषद् भारतीय शासन-व्यवस्था की धुरी है. संघ सरकार के सभी महत्वपूर्ण निर्णय मंत्रीपरिषद् द्वारा ही लिए जाते हैं. यह संघ-सरकार के सभी महत्वपूर्ण निर्णय मंत्रीपरिषद् द्वारा ही लिए जाते हैं. यह संघ सरकार के संपूर्ण प्रशासन की देखरेख करता है. सरकार की नीतियों का निर्धारण करता है तथा उनका क्रियान्वयन करता है. उनका निर्देशन करता है. और उनमें समन्वय और सामंजस्य स्थापित करता है. राज्यों को निर्देश देने का कार्य मंत्रीपरिषद् ही करता है. मंत्रीपरिषद् ही संसद में कानून निर्माण को दिशा प्रदान करती है. ये विधेयक संसद में प्रस्तुत किए जाते हैं तथा पारित करवाएं जाते हैं. मंत्री परिषद् के सदस्य ससंद में विधेयक पर बहस में भाग लेते हैं. मंत्रीपरिषद् के सदस्य संसद में विधेयक पर बहस मेंभाग लेते हैं. मंत्रीपरिषद् सदस्यों द्वारा उठाई गई शंकाओं को दूर करती है. संघीय बजट इसके निर्देशन में तैयार किया जाता है तथा उसे संसद से पारित करवाया जाता है. राष्ट्रपति के आपातकालीन शक्तियों के प्रयोग तथा संविधान संशोधन की आवश्यकता पर भी निर्णय मंत्रीपरिषद् ही लेती है.


प्रधानमंत्री :-


भारतीय शासनव्यवस्था में प्रधानमंत्री के पद का विशेष महत्व है. प्रधानमंत्री के हाथ में देश के संपूर्ण शासन की नकेल होने के निम्नलिखित पाँच कारण हैं :-


1.   राष्ट्रपति के लिए प्रधानमंत्री अनिवार्य है. 

2.   राष्ट्रपति के साधारणकालीन अधिकार का वास्तविक प्रयोग. 

3.   राष्ट्रपति के आपातकालीन अधिकार का भी वास्तविक प्रयोग. राज्यों को केन्द्र द्वारा निर्देश देने की व्यवस्था. 

4.   योजना-आयोग के अधिकार और कार्य.


राष्ट्रपति के सभी अधिकारों का प्रयोग प्रधानमंत्री की राय से ही किया जाता है. केन्द्र द्वारा राज्यों को निर्देश भी प्रधानमंत्री की प्रेरणा से दिया जाता है. योजना-आयोग का अध्यक्ष प्रधानमंत्री ही होता है. अत: योजना आयोग के अधिकार एवं कार्य पर प्रधानमंत्री का ही नियंत्रण रहता है. विकासशील देश में योजना का बहुत महत्व है. इसलिए भी योजना के कार्यान्वयन में प्रधानमंत्री दिलचस्पी रखते हैं. प्रधानमंत्री इसके अध्यक्ष होने के नाते अन्य राज्यों पर भी छाया रहता है. व्यवहारिक रूप से प्रधानमंत्री प्रत्यक्ष प्रशासनाध्यक्ष होता है.


प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति :-


यद्दपि प्रधानमंत्री की नियुक्त और पदच्युत राष्ट्रपति द्वारा ही की जाती उही, तथापि प्रधानमंत्री अपने पद के लिए राष्ट्रपति का मुँह नहीं जोहता. इसका कारण यह है कि राष्ट्रपति को लोकसभा में बहुमत दल के नेता को ही प्रधानमंत्री पद पर नियुक्त करना पड़ता है. जब तक प्रधानमंत्री को लोक सभा का बहुमत प्राप्त है, तब तक उसकी पदच्युति संभव नहीं संभव नहीं. बहुमत रहते उसे हटाने पर संवैधानिक संकट उत्पन्न हो जाएगा, शासन का चलना मुश्किल हो जाएगा. इसके अतिरिक्त संविधान में यह प्रावधान है कि प्रशासन यद्दपि राष्ट्रपति के नाम और मुहर में चलेगा, लेकिन वह अकेले सब काम नहीं कर सकता. उसकी सहायता और परामर्श के लिए मंत्रीपरिषद् होगी. मंत्रीपरिषद् के बिना राष्ट्रपति काम ही नहीं कर सकता है और मंत्रीपरिषद् के गठन की पहली कड़ी प्रधानमंत्री की नियुक्ति है. इसलिए प्रधानमंत्री का होना राष्ट्रपति के लिए अनिवार्य है.


प्रधानमंत्री और मंत्रीपरिषद् :-


प्रधानमंत्री मंत्रीपरिषद् का जन्मदाता, जीवनदाता और मृत्युदाता है. उसी की अनुशंसा पर सभी मंत्री नियुक्त किए जाते हैं तथा हटाएँ जाते हैं. लोकसभा में मंत्रीपरिषद् के विरुद्ध अविश्वास का प्रस्ताव पारित न हो इसके लिए प्रधानमंत्री सचेष्ट रहता है. प्रधानमंत्री के इस्तीफा देने पर समूची मंत्रीपरिषद् विघटित हो जाती है.


प्रधानमंत्री मंत्रियों के बीच विभागों का बंटवारा करता है. मंत्रीमंडल का बैठक की अध्यक्षता करता है. राष्ट्रपति को मंत्रीमंडल के निर्णयों की सूचना देता है. लोकसभा में मंत्रीपरिषद् का परिषद् का प्रतिनिधित्व करता है. इन सब कारणों से प्रधानमंत्री मंत्रियों के बीच ठीक ऐसे ही होता है, जैसे तारों के बीच चन्द्रमा.


संसद के नेता :


प्रधानमंत्री संसद का खासकर लोकसभा का नेता होता है. राज्य सभा में उसके दल का बहुमत होने पर उसका नेता प्रधानमंत्री की इच्छा के अनुसार ही निर्वाचित किया जाता है.


प्रधानमंत्री की सलाह से संसद की कार्यतालिका तैयार की जाती हजी. संसद में व्यवस्था बनाएं रखने में उसकी भूमिका अहम होती है. महत्वपूर्ण विषयों पर वही संसद में सरकार का अंतिम प्रवक्ता के रूप में माना जाता है.


उसकी अनुशंसा पर ही राष्ट्रपति लोकसभा को विघटित करता है. इस शक्ति के कारण वह लोकसभा के सदस्यों पर अपना वर्चस्व तथा नियंत्रण रखता है. जो एक बार प्रधानमंत्री बन जाता है वह देश का नेता बन जाता है.


अपने दल का नेता :


प्रधानमंत्री का पद धारण करते ही वह सत्ता-शक्ति संपन्न हो जाता है. फलस्वरूप वहअपने राजनीतिक दल के संगठन पर ही हावी हो जाता है. अपने दल के कार्यक्रम और नीति के निर्धारण में उसकी महत्वपर्ण भूमिका रहती है. चुनाव के समय प्रत्याशियों का चयन करने में उसकी बात सुनी जाती है. उनको विजयी बनाने में सबसे बड़ा हाथ उसी का रहता है. राज्यों में भी यदि उसकी पार्टी की सरकार है तो वहाँ के मुख्यमंत्री भी उसी के निर्देश के अनुसार कार्य करते हैं. इस प्रकार वह अपने दल का एक प्रमुख नेता बन जाता है. जिस राज्य में प्रधानमंत्री की दल की सरकार नहीं है, वहाँ भी प्रधानमंत्री के निर्देशों की उपेक्षा नहीं  की जा सकती.


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