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देश का प्रधान राष्ट्रपति होता है. उसी प्रकार राज्य का प्रधान राज्यपाल होता है. प्रधानमंत्री तथा राज्य-स्तर पर मुख्यमंत्री के बारे में तुम रोज अख़बारों में पढ़ते हो. इन लोगों का काम क्या है? उन्हें कौन चुनता है या नियुक्त करता है, इन सबकी जानकारी भारतीय संविधान से मिलते है. हर सरकार की तरह भारत सरकार के भी तीन अंग हैं – विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका. विधायिका कानून बनाती है. भारत में इसे संसद कहते हैं, जो पूरे देश के लिए कानून बनाती है. इसके दो सदन है – लोक सभा और राज्य सभा. जो शाखा कानूनों को कार्य रूप देती है, उसे कार्यपालिका कहते हैं. इसके अंतर्गत राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद होती है. जो अंग कानून के अनुसार झगड़ों का निपटारा कराती है, वह न्यायपालिका कहलाती है, जिसके अंतर्गत उच्चतम न्यायालय उच्च न्यायालय आते हैं. भारतीय संविधान इन सब विषयों की भी जानकारी देता है.

संविधान का अर्थ : sanvidhan ke arth

भारतीय संविधान में उपर्युक्त तीनों अंगों के अधिकार और कार्य का वर्णन किया गया है. इस तरह कहा जा सकता है कि संविधान नियमों का संकलन है, जिसके आधार पर देश का शासन संचालित होता है. संविधान में राष्ट्रीय लक्ष्य, लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, समाजवाद का समावेश है. इसकी पूर्ति के लिए संविधान में सरकार बनाने की योजना है. साथ ही इसमें हमारे अधिकार और कर्तव्य का भी उल्लेख है. अतएव संविधान हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है और हमारा कर्तव्य है कि इसका समुचित आदर करें.

भारतीय जनता के प्रतिनिधियों ने बहुत वाद-विवाद एवं चर्चा के पश्चात् इस संविधान का निर्माण किया. 15 अगस्त, 1947 को हमारा देश स्वतंत्र हुआ, जिसके लिए देशवासियों को ब्रिटिश सरकार से एक लंबेअरसे तक संघर्ष करना पड़ा. इस स्वतंत्रता आन्दोलन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस सबसे आगे थे. इस आन्दोलन का नेतृत्व महात्मा गाँधी, जवाहर लाल नेहरू, मौलाना अबुल कलाम आजाद और अन्य नेताओं ने किया. इस दल में अलग-अलग समुदाय के लोग शामिल थे.कुछ दूसरे राजनीतिक दल भी थे, जैसे मुस्लिम लीग, जिसका नेतृत्व मोहम्मद अली जिन्ना कर रहे थे. वे मुसलमानों के लिए अलग राज्य पाकिस्तान चाहते थे उनका सोचना था कि भारत को आजादी मिलने पर वहाँ हिन्दू बहुमत का वर्चस्व रहेगा और मुसलमानों के प्रति भेदभाव बरता जाएगा. कांग्रेस पाकिस्तान की मांग से सहमत नहीं थी. उसका ख्याल था कि भारत देश हिन्दू, मुसलमान, सिक्ख, ईसाई और दूसरे बहुत से समुदायों को मिलाकर बना है. वे सब मिलकर एक राष्ट्र और देश का निर्माण करते हैं. कांग्रेस पार्टी सभी –समुदायों के हितों का प्रतिनिधित्व करती है.

1939 में दूसरा विश्व-युद्ध शुरू हुआ. महात्मा गाँधी ने इस लड़ाई में सरकार को साथ देने से इंकार किया और राष्ट्रीय स्वाधीनता संघर्ष को तेज किया. ऐसी स्थिति में ब्रिटिश सरकार ने भारतीय स्वंतत्रता संबंधी प्रश्न का हल निकालने के लिए एक शिष्टमंडल को भारत भेजा, जिसमें ब्रिटेन के मंत्रीमंडल के तीन सदस्य थे. यह शिष्टमंडल कैबिनेट मिशन के नाम से प्रसिद्ध है.

कैबिनेट मिशन ने अनुशंसा की कि भारत के संविधान की रचना के लिए संविधान सभा हो. संविधान सभा वह सभा है, जो अपने देश के लिए संविधान बनाती है.मिशन की सिफारिशों के आलोक में जुलाई, 1946 ई. में भारतीय संविधान सभा के गठन के लिए चुनाव हुआ. सदस्यों का चुनाव प्रांतीय सभाओं के सदस्यों के द्वारा किया गया, न कि सीधा जनता के द्वारा. 10 लाख की जनसंख्या पर एक प्रतिनिधि के आधार पर सदस्यों की संख्या निर्धारित हुई. कुल सदस्यों की संख्या 389 थीं, जिसमें अधिकांश सदस्य कांग्रेस पार्टी के थे. पाकिस्तान बनने के पूर्व भी लीग के सदस्यों ने संविधान सभा की पहली बैठक, जो 9 दिसम्बर, 1946 ई. को आयोजित हुई थी, उसका बहिष्कार किया. 1947 में पाकिस्तान की स्थापना हुई. अतएव मुस्लिम लीग के सदस्य पाकिस्तान चले गए यानी संविधान सभा के सदस्यों की संख्या 308 रह गई.

उक्त बैठक में भारत के विभिन्न क्षेत्रों एवं समुदायों के सदस्यों थे. विभिन्न राजनीतिक दलों का प्रतिनिधित्व करने वाले सदस्य भी थे. देश के अच्छे विधि विशेषज्ञ भी सभा में रखे गए थे. पंडित जवाहर लाल नेहरू डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, सरदार बल्लभ भाई पटेल, मौलाना अबुल कलाम आजाद, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी तथा सरदार बलदेव सिंह जैसे ख्याति-प्राप्त महत्वपूर्ण नेता ने भी संविधान सभा की चर्चाओं का दिशा-निर्देशन किया. 30, से अधिक सदस्य अनुसूचित जातियों के थे और अल्पसंख्यक वर्ग, जैसे – ऐंग्लो इडियन और पारसियों का प्रतिनिधित्व क्रमशः श्री फ्रैंक एन्थनी और डॉ. एच. पी. मोदी ने किया. श्री अल्लादि  कृष्ण स्वामी अय्यर, डॉ. बी. आर. आंबेडकर तथा श्री के. एम. मुंशी जैसे क़ानूनी विशेषज्ञ भी सभा के सदस्य थे. महिला सदस्य के रूप में श्रीमती सरोजनी नायडू और श्रीमती विजया लक्ष्मी पंडित थीं. प्रारंभ में संविधानसभा ने डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को सभापति चुना. संविधान का प्रारंभ करने के लिए डॉ. बी.आर. आंबेडकर के सभापतित्व में प्रारूप समिति गठित की गई, जिसके अन्य प्रमुख सदस्य श्री एन. गोपाल स्वामी आयंगर श्री अल्लादि कृष्णा स्वामी अय्यर श्री के. एम. मुंशी और श्री सैयद मोहम्मद सादुल्ला थे.

इस काम को पूरा करने में करीब तीन साल लगे और उक्त अवधि में 6.4 करोड़ रूपए खर्च हुए. सभा के सभी अधिवेशन जनता एवं पत्रकारों के लिए खुले थे. आम लोगों को अपने दृष्टिकोण और विचारों को समाचार-पत्रों के माध्यम से प्रकट करने की छूट थी. इस प्रकार संविधान के निर्माण में परोक्ष रूप से देश की जनता भी शामिल थी.

26 नवंबर, 1949 ई. को संविधान पारित कर दिया गया था. परन्तु यह 26 जनवरी 1950 ई. से लागू हुआ. चूँकि, दिसंबर, 1929 ई. के अपने लाहौर अधिवेशन में कांग्रेस ने भारत की पूर्ण स्वतंत्रता के संघर्ष का निर्णय लिया था और 26 जनवरी, 1930 ई. को पूर्ण स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया जाता था. यही वह कारण है कि हमारे नेताओं ने संविधान को अमल में लाने के लिए 26 जनवरी, 1950 ई. का  दिन चुना. इसी दिन भारत को गणतंत्र घोषित किया गया, तब से हम प्रत्येक 26 जवनरी को गणतंत्र दिवस के रूप में मनाते हैं. 1947 ई. में जब भारत आजाद हुआ, उस समय लार्ड माउंट बैटन भारत के गवर्नर जेनरल थे. उसके बाद पहला भारतीय गवर्नर जेनरल श्री सी. राजगोपालचारी बने. 1950 ई. में संविधान के लागू होने पर डॉ. राजेन्द्र प्रसाद 1952 ई. में देश के पहले निर्वाचित राष्ट्रपति बने. इस प्रकार स्वतंत्र भारत ने अपना संविधान बनाया.


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