सर्वोच्च न्यायालय I Supreme Court I GK I objective questions answers


सर्वोच्च न्यायालय

    1.   भारत में सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124 के तहत की गई है. अनुच्छेद 124 में न्यायाधीशों की संख्या का भी उल्लेख है. जब संविधान प्रारंभ हुआ तब उस समय उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या मुख्य न्यायमूर्ति के अतिरिक्त सात थी. संसद ने उच्चतम न्यायालय न्यायाधीश संख्या अधिनियम 1956 अधिनियमित करके इस संख्या को दस दस कर दिया, 1960 में बढ़ाकर तेरह, 1977 में सत्रह और 1986 में इसे 26 (मुख्य न्यायाधीश सहित) कर दिया. 2008 के अधिनियम के तहत मुख्य न्यायाधीशों सहित सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की कुल संख्या 31 रखने का प्रावधान किया गया है. 
    2.     प्रश्नकाल के दौरान यह संख्या 25 थी जिसे 2008 के अधिनियम (फरवरी, 2009 में अधिसूचित) के द्वारा बढ़ाकर 30 कर दिया गया है. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124(1) के अनुसार उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि करने की शक्ति संसद के पास है. ध्यातव्य है कि उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की संख्या विहित करने का अधिकार राष्ट्रपति के पास है. 
    3.        उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश राष्ट्रपति द्वारा साबित कदाचार या असमर्थता के आधार पर संसद की सिफारिश पर महाभियोग प्रस्ताव (यद्दपि संविधान में महाभियोग शब्द का इस संदर्भ में उल्लेख नहीं है) पारित होने के बाद हटाए जा सकते हैं, इस प्रक्रिया का वर्णन संविधान के अनुच्छेद 124(4) एवं (5) में किया गया है. 
    4.     सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों के लिए सेवानिवृत्ति की आयु 65 वर्ष है,जबकि उच्च न्यायालयों में यह 62 वर्ष है.संविधान के अनुच्छेद 125(1) के तहत उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतन का निर्धारण संसद द्वारा बनाई गई विधि के तहत किया जाता है. 
    5.     उच्चतम न्यायालय को देश के संविधान के प्रहरी माना जाता है, अत: उसकी स्वायत्तता को बनाए रखने के लिए संविधान में कई उपबंध मौजूद हैं. उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश की नियुक्ति करते समय राष्ट्रपति को सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति करते समय राष्ट्रपति को सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीशों से परामर्श करना आवश्यक होगा. न्यायाधीशों से परामर्श करना आवश्यक होगा. न्यायाधीशों को राजनीतिक के प्रभाव से दूर रखने के लिए उनका वेतन भारत की संचित निधि पर भारित होता है जिसके लिए संसद में मतदान नहीं होता है. 
    6.   संविधान के अनुच्छेद 124(7) के अनुसार सेवानिवृत्त होने के बाद सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश किसी भी न्यायालय में वकालत नहीं कर सकते, जबकि अनुच्छेद 220 के अनुसार उच्च न्यायालय के न्यायाधीश सेवानिवृत्त होने के बाद उच्चतम न्यायालय मेन एवं अन्य उच्च न्यायालयों (जिस उच्च न्यायालय में स्थायी न्यायाधीशों रहा हो, उसमें नहीं) में वकालत कर सकते हैं. 
    7.   अनुच्छेद 126 के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है. ऐसा तब किया जाता है जब मुख्य न्यायाधीश का पद रिक्त हो  अथवा वह अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने में असमर्थ हो. 
    8.  सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124(2) के तहत राष्ट्रपति द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के और राज्यों के उच्च न्यायालयों के ऐसे न्यायाधीशों से परामर्श के बाद, जिनसे रष्ट्रपति इस प्रयोजन के लिए परामर्श करना आवश्यक समझे, की जाती है, परन्तु मुख्य न्यायमूर्ति से भिन्न किसी न्यायाधीश की नियुक्ति की स्थिति में मुख्य न्यायमूर्ति से परामर्श आवश्यक है. 1993 में दिए गए एक निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने इस संबंध में मुख्य न्यायाधीश की सलाह को राष्ट्रपति के लिए बाध्यकारी करते हुए इसके साथ सर्वोच्च न्यायालय के चार अन्य वरिष्ठतम न्यायाधीशों का परामर्श (लिखित) आवश्यक होने का निर्णय दिया गया. 
    9.     संविधान के अनुच्छेद 127(1) के अनुसार यदि किसी समय सर्वोच्च न्यायालय के सत्र को आयोजित करने या चालू रखने के लिए उस न्यायालय के न्यायाधीशों की गणपूर्ति पर्याप्त न हो तो भारत का मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति करता है. वह ऐसा राष्ट्रपति की पूर्व सहमति एवं संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के परामर्श के बाद करता है. तदर्थ न्यायाधीशों की नियुक्ति संबंधी प्रावधान केवल सर्वोच्च न्यायालय के सन्दर्भ में है, अन्य न्यायालयों के लिए नहीं है. 
10.   सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति की अनुशंसा राष्ट्रपति को करने वाले मंडल में सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के अतिरिक्त 4 अन्य वरिष्ठतम न्यायाधीश शामिल है. 
11.     उच्चतम न्यायालय में संविधान के निर्वचन से संबंधित मामले की सुनवाई करने के लिए न्यायाधीशों की संख्या कम से कम पाँच होनी चाहिए.इसे संविधान पीठ के रूप में अभिहित किया जाता है.

2.      केन्द्र और राज्य के बीच होने वाले विवादों का निर्णय करने की सर्वोच्च न्यायालय की शक्ति इसकी मूल अधिकारिकता (आरंभिक अधिकारिकता) के तहत आती है अनूच्छेद 131. 
13.    केशवानंद भारती केस (1973) में उच्चतम न्यायालय द्वारा अब तक की सबसे बड़ी खड़पीठ (13 न्यायाधीश) का गठन किया गया था. उच्चतम न्यायालय द्वारा दूसरी सबसे बड़ी खंडपीठ (11 न्यायाधीश) का गठन गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य वाद (1967) में किया गया था.
14.   संविधान के अनुच्छेद 137 के तहत संसद द्वारा बनाई गई किसी विधि के या अनुच्छेद 145 के अधीन बनाए गए नियमों के उपबंधों के अधीन रहते हुए उच्चतम न्यायालय को अपने द्वारा दिए गए निर्णय अथवा आदेश के पुनर्विलोकन हेतु अधिकृत किया गया है. 
15.   न्यायिक पुनर्विलोकन का अर्थ यह है i सर्वोच्च न्यायालय राज्य के किसी भी कानून को अवैध घोषित कर सकता है. यदि राज्य के द्वारा बनाए गए कानून संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन करते है तो सर्वोच्च न्यायालय उन्हें असंवैधानिक एवं शून्य घोषित कर सकता है.न्यायालय की यह अधिकारिक न्यायिक पुनर्विलोकन कहलाती है. 
16.     कोई भी संविधान संशोधन कानून भारतीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा असवैधानिक घोषित किया जा सकता है यदि वह विधि के समक्ष समानता के अधिकार को भाग 3 से हटाकर संविधान में अन्यत्र कही रखता है, क्योंकि भाग 3 का अनुच्छेद 13(2) यह उल्लेख करता है कि राज्य ऐसी कोई विधि नहीं बना सकता जो इस भाग में दिए गए अधिकार को छिनती हो या कम करती हो और यदि ऐसी कोई विधि बनायीं जाती है तो शून्य होगई 
17.    संविधान की व्याख्या करने का अंतिम अधिकार सरोच्च न्यायालय को है. सर्वोच्च न्यायालय को संविधान का संरक्षक घोषित किया गया है. 
18.   भारतीय संविधान के अनुच्छेद 143 के तहत भारत के राष्ट्रपति को विधि या तथ्य के व्यापक महत्त्व के प्रश्न के सन्दर्भ में सर्वोच्च न्यायालय से परामर्श लेने की शक्ति प्रदान की गई है. 
19.   संविधान के अनुच्छेद 138(1) के अनुसार विधायी शक्तियों की संघीय सूची में समाविष्ट किसी विषय के संबंध में भारत के उच्चतम न्यायालय के अधिकार क्षेत्र को बढ़ाने का अधिकार संसद को दिया गया है. 
20.    अनुच्छेद 143 के अनुसार राष्ट्रपति सर्वोच्च न्यायालय से दो प्रकार के विषयों पर सलाह मांग सकता है-a. लोक तत्व महत्व के विषयों में विधि या तथ्य संबंधी b. किसी पूर्व संवैधानिक संधि, समझौते या अन्य समकक्षीय विषयों पर प्रथम मामले में परामर्श देना सर्वोच्च न्यायालय के लिए बाध्यकारी नहीं है किन्तु द्वितीय मामले में वह परामर्श अवश्य देता है. परामर्शी अधिकारिता की शक्ति के अधीन प्राप्त निर्देश पर सुनवाई 5 सदस्यीय पूर्ण पीठ करती है. न्यायालय द्वारा दिया गया परामर्श सरकार पर बाध्यकारी नहीं है. यह आवश्यक नहीं कि एक बार में केवल एक ही परामर्श हेतु निर्देश भेजे जाएँ. 
21.    अनूच्छेद 143(1) के अनुसार भारत का उच्चतम न्यायायल कानून या तथ्य के मामले में राष्ट्रपति को परामर्श देता है जब राष्ट्रपति उससे ऐसे परामर्श के लिए कहता है. 
22.   संविधान के अनुच्छेद 124 के तहत उच्चतम न्यायालय का प्रत्येक न्यायाधीश राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किया जाता है. राष्ट्रपति उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालयों में किसी भी न्यायाधीश की नियुक्ति भारत के मुख्य न्यायाधीश की राय के अनुरूप करेगा. अनुच्छेद 124(3) के अनुसार, उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए निम्नलिखित योग्यताएं होनी चाहिएं :
क.   वह भारत का नगरिक हो
ख.   किसी उच्च न्यायालय का कम से कम 5 वर्ष तक न्यायाधिश रहा होग.    किसी उच्च न्यायालय में कम से कम 10 वर्ष तक अधिवक्ता रहा हो,
घ.    वह राष्ट्रपति की राय में पारंगत विधिवेत्ता हो. 
23.    संविधान के भाग तीन में वर्णित नागरिकों के मूल अधिकारों की रक्षा का अनन्य अधिकार संविधान द्वारा उच्चतम एवं उच्च न्यायालों को दिया गया है. उच्चतम न्यायायल अनुच्छेद 32 के तहत तथा उच्च न्यायालय अनुच्छेद 226 के तहत मौलिक अधिकारों की बहाली के लिए बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, उत्प्रेषण और अधिकार पृच्छा संबंधी रिट निकाल सकते हैं. शेष सभी प्रश्नगत मामले उच्चतम न्यायालय की ही अधिकारिता में आते हैं. 
24.    देश में किसी भी न्यायालय में चल रहे वाद की सुनवाई किसी अन्यत्र स्थान पर किए जाने का निर्देश देने का  आधिकार सर्वोच्च न्यायालय के पास है (अनुच्छेद 13क). 
25.   लोकहित वाद (मुकदमे) की संकल्पना का उद्भव यू. एस. ए. (अमेरिका) से हुआ है. भारत में लोकहित वाद की शुरुआत का श्रेय न्यायमूर्ति पी. एन. भगवती को जाता है.    

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