GK I Objective Questions Answers in hindi I पंचायती राज व्यवस्था


पंचायती राज व्यवस्था

 पंचायती राज व्यवस्था, general knowledge in hindi
 पंचायती राज व्यवस्था 

 1.        अनुच्छेद 243-A के अनुसार प्रत्येक राज्य में तीन प्रकार (नगर पंचायत, नगरपालिका परिषद तथा नगर निगम) की नगरपालिकाएं होती हैं. 
 2.        पंचायतों को संविधान की 7 वीं अनुसूची में राज्य सूची की प्रविष्टि 5 का विषय माना गया है. इस प्रकार पंचायत राज्य सरकार का विषय है. इसके गठन तथा चुनाव कराने का अधिकार राज्यों को ही है. 
 3.        अनुच्छेद 243(ड.) के अनुसार पंचायतों की अवधि उनके प्रथम आधिवेशन से पाँच वर्ष तक होती है तथा इस अवधि से पूर्व नए चुनाव आवश्यक हैं. यदि राज्य विधानमंडल द्वारा पंचायत का समय पूर्व विघटन कर दिया जाता है तो विघटन के छ; माह से पूर्व नए चुनाव कराए जाना आवश्यक है. 
 4.        संविधान का 74 वां संशोधन अधिनियम पंचायतों से नहीं वरन नगर पालिकाओं से संबंधित है. 
 5.        73वां और 74वां संविधान संशोधन, 1992 (24 अप्रैल, 1993 से लागू) में हुआ था. इस समय भारत के प्रधानमन्त्री पी.वी. नरसिंहराव थे, जिनका कार्यकाल 1991-96 के मध्य था. 73वां और 74 वां संविधान क्रमशः संशोधन क्रमश राज्य की पंचायतों एंव नगरपालिकाओं से संबंधित था. 
 6.        73वां संविधान संशोधन 1993 के द्वारा पंचायतों को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया गया है. इसमें अनुच्छेद 243-घ के तहत अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति की महिलाओं के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई है. साथ ही प्रत्येक पंचायत में प्रत्यक्ष निर्वाचन से भरे जाने वाले कुल स्थानों में से 1/3 स्थान महिलाओं के लिए आरक्षित किए गए हैं. इस आरक्षण से स्थानीय स्वशासन के स्तर पर महिलाओं में काफी जागरूकता आई है. भारत में महिला सशक्तिकरण की दिशा में यह एक महतवपूर्ण कदम समझा जा रहा है. 
 7.        पंचायती राज स्थानीय स्तर पर स्वशासन की एक व्यवस्था है. बलवंत राय मेहता ने इसे लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण की व्यवस्था कहा है. यह एक प्रकार से त्रि-स्तरीय जैविकी संबंधों की अभिशासन संरचना है.  
8.        संविधान का अनुच्छेद 40 राज्य को ग्राम पंचायतों को संगठित करने का निर्देश देता है. यह राज्य के नीति निदेशक तत्वों में शामिल है. अनुच्छेद 40 में उपबंधित है कि राज्य ग्राम पंचायतों का गठन करने के लिए कदम उठाएगा और उनको ऐसी शक्तियां प्रदान करेगा, जो उन्हें स्वायत्त शासन की इकाइयों के रूप में कार्य करने योग्य बनाने के लिए आवश्यक हो. 
 9.        73 वां संविधान संशोधन द्वारा ही पंचायतों को संवैधानिक दर्जा प्रदान कर उन्हें स्वशासन की इकाई के  रूप में संगठित किया गया है. 
10.        भारतीय संविधान के तहत भाग-iv में राज्य के नीति निदेशक तत्वों के अंतर्गत अनुच्छेद 43 में कहा गया है कि राज्य, उपयुक्त विधान या आर्थिक संगठन द्वारा या किसी अन्य रीति से कृषि के, उद्दोग के या अन्य प्रकार के सभी कर्मकारों को काम, निर्वाह मजदूरी, शिष्ट जीवन स्तर और अवकाश का संपूर्ण उपभोग सुनिश्चित करने वाली काम की दशाएं प्रदान करने का प्रयास करेगा. मनरेगा राज्य के इसी संवैधानिक लक्ष्य की पूर्ति की दिशा में एक कार्यक्रम है. 
11.        पंचायती राज प्रणाली स्थानीय स्तर पर त्रिस्तरीयशासन की व्यवस्था करता है. ग्राम स्तर पर ब्लाक स्तर पर एवं जिला स्तर पर. पंचायती राज का उद्देश्य स्थानीय ग्रामीण समुदाय को सामाजिक-आर्थिक न्याय प्रदान करना है. 
12.        पंचायती राज का प्रधान लक्ष्य ग्रामवासियों में शक्ति का विकेंद्रीकरण है, जिससे वे अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप नीतियाँ बना सकें एवं लागू कर सकें 
13.        भारत में पंचायत व्यवस्था ग्रामीण जीवन का युगों से एक अभिन्न अंग रही है तथा 73 वें संविधान संशोधन अधिनियम (जो कि 24 अप्रैल, 1993 से प्रभावी हुआ) द्वारा इसे संवैधानिक दर्जा प्रदान किया गया. 73 वें संशोधनों के द्वारा त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था अपनाई गई है जो कि जैविकीय रूप से जुड़ी संरचना मानी जा सकती है. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 243 जी में पंचायतों की शक्तियाँ, प्राधिकार एवं उत्तरदायित्व संबंधी प्रावधान हैं जो पंचायतों के महत्व को बढ़ाते है. 
14.        पंचायती राज व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य आम जनता को विकासमूलक प्रशासन में भागीदारी के योग्य बनाना है. सत्ता के विकेंद्रीकरण का यह मुख्य उपकरण है. 73वें संविधान संशोधन (1992) द्वारा पंचायतों को तथा 74वें संविधान संशोधन (1992) द्वारा नगरपालिकाओं को संवैधानिक स्वरूप प्रदान किया गया है. 
15.        पंचायतीराज को सफलतापूर्वक पूर्वक कार्य करने के लिए स्थानीय जनता के पूर्ण सहयोग की आवश्यकता होती है. बिना जन भागीदारी के पंचायती राज का स्वप्न साकार नहीं हो सकता है. 
16.        भारत में पंचायती राज की स्थापना ग्रामीण जनता के सर्वांगीं विकास के लिए की गई है. यह शक्तियों के विकेंद्रीकरण, लोगों की भागीदारी एवं सामुदायिक विकास इन तीनो का प्रतिनिधत्व करता है. 
17.        भारत में त्रि-स्तरीय पंचायती राज्यव्यवस्था स्थापना की सिफारिश बलवंत राय मेहता समिति (1957) ने की थी. इन सिफारिशों के आधार पर ही राजस्थान की विधान सभा ने 2 सितंबर, 1959 को पंचायती राज अधिनियम पारित किया. अधिनियम के प्रावधानों के अनुरूप प. जवाहर लाल नेहरू ने 2 अक्टूबर, 1959 को राजस्थान के नागौर जिले में पंचायती राज का उद्घाटन किया. इसके अतिरिक्त पंचायतों में सुधार के लिए 1977 में अशोक मेहता समिति, 1985 में जी. वी. के राज समिति तथा 1986 में डॉ. एल. एम. सिंघवी समिति का भी गठन किया गया. 
18.        संविधान के अनुच्छेद 40 में राज्य को पंचायतों के गठन का निर्देश दिया गया है. 1957 में बलवंत राय मेहता समिति ने त्रि-स्तरीय पंचायतों के गठन की सिफारिश की. इनकी सिफारिश के आधार पर पं. जवाहर लाल नेहरू ने 2 अक्टूबर, 1959 को राज्यस्थान के नागौर जिले में पंचायती राज का उद्घाटन किया. तत्पश्चात आंध्र प्रदेश भी इस व्यवस्था को अपनेयहाँ लागू कर पंचायती राज प्रणाली लागू करने वाला दूसरा राज्य बन गया. 
19.        बलवंत राय मेहता ने नवम्बर, 1957 में पंचायती राज पर अपनी सिफारिश प्रस्तुत की, जिसमें उन्होंने पजतान्त्रिक विकेंद्रीकरण की सिफारिश की. इसके अनुसार तीन स्तरों पर पंचायती राज संस्थाओं का गठन होना था :जिला स्तर, ब्लॉक स्तर, ग्राम स्तर पर. 
20.        अशोक मेहता समिति, संथानम समिति बी. आर. मेहता समिति इन तीनों समितियां राज व्यवस्था के संबंध में सुझाव देने हेतु गठित की गई टी 
21.        1977 में गठित अशोक मेहता समिति ने अगस्त, 1978 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की थी जिसमें पंचायती राज के लिए त्रि-स्तरीय प्रतिमान के स्थान पर द्वि-स्तरीय प्रतिमान की संस्तुति की गई थी. इसमें जनपद स्तर पर जिला परिषद तथा 15000 से 20000 जनसंख्या (गाँवों के समूह) पर मंडल पंचायत के गठन का सुझाव था. 
22.        भारत में पंचायती राज्य की स्थापना ग्रामीण जनता के सर्वांगीण विकास के लिए की गई. यह शक्तियों के विकेंद्रीकरण, लोगों की भागीदारी एवं सामुदायिक विकास इन तीनों का प्रतिनिधित्व करता है. 
23.        पंचायती राज्य को संवैधानिक स्थिति प्रदान करने की संस्तुति एल. एम. सिघवी समिति (1986) द्वारा की गई थी. साथ ही सिंघी समिति ने पंचायत चुनावों को गैर-दलीआधार पर कराने की भी अनुशंसा की थी. 
24.        73वें संवैधानिक संशोधन, 1992 (24 अप्रैल, 1993 से प्रभावी) द्वारा संविधान मेंभाग ix एवं 11वीं अनुसूची जोड़कर पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक स्तर प्रदान किया गया. 73 वें संविधान संशोधन 1992 के समय प्रधानमंत्री स्व. पी. वी. नरसिंहराव थे. 
25.        संविधान के 73 वें संशोधन ने पंचायतों को शक्ति प्रदान की है. उनके नियमित चुनाव होंगे. सभी स्तरों पर महिलाओं के लिए एक-तिहाई स्थान आरक्षित होंगे. उनकी वित्तीय स्थिति सुदृढ़ करने हेतु राज्य वित्त आयोग के गठन का प्रावधान किया गया है. यह राज्यपाल द्वारा गठित किया जाएगा. पंचायतों को 11 वीं अनुसूची में दिए गए विषयों पर कार्य की पूर्ण शक्ति होगी. इस अनुसूची में 29 विषयों का वर्णन है. 
26.        73 वें संविधान संशोधन (1992) द्वारा त्रि-स्तरीय पंचायती राज व्यवस्था अपनाई गई है जिसमें ग्राम पंचायत, क्षेत्र पचायत एवं जिला पंचायत सम्मिलित हैं. नगरपालिकाओं के लिए व्यवस्था 74 वें संविधान संशोधन द्वारा की गई है. 
27.        73वें संशोधन के तहत पंचायतों के पदों के रिक्त होने पर उनका निर्वाचन आज्ञापरक किया गया है. 
28.        73वां संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 देश में मजबूत एवं जीवंत पंचायती राज संस्थाओं की बुनियाद रखता है. संविधान के भाग 9 के अनुच्छेद 243(क) से 243 (ण) तक में इसका उल्लेख किया गया है. 
29.        73वें संशोधन में यह शामिल नहीं है कि पंचायती राज निर्वाचित कार्यकर्ता अयोग्य होंगे. यदि उनके दो से अधिक संतानें हैं. यह प्रावधान केवल हरियाणा राज्य सरकार ने किया है. 
30.        पंचायतों के सदस्यों के लिए नियमित पारिश्रमिक का प्रावधान 1992 में अधिनियम 73वें संविधान संशोधन अधिनियम में नहीं है. 
31.        महिलाओं को पंचायतों में आरक्षण संविधान का 73वां संशोधन करके दिया गया है. अनुच्छेद 243 घ (3) के अनुसार पंचायतों में सभी स्तरों पर महिलाओं को एक तिहाई आरक्षण प्रदान किया गया है. 
32.        73वें संविधान संशोधन के अनुक्रम में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा उत्तर प्रदेश पंचायत विधि (संशोधन)विधेयक, 1994 पारित किया गया जो 22 अप्रैल, 1994 से प्रदेश में प्रवृत हुआ. इसके तहत प्रदेश में पंचायती राज सस्थाओं में प्रत्येक स्तर पर महिलाओं के लिए कुल स्थानों के एक तिहाई स्थान आरक्षित किए गए है. 
33.        संविधान के प्रावधानों के तहत पंचायत चुनाव कराने का निर्णय राज्य सरकार द्वारा किया जाता है. अनुच्छेद 243-k के तहत किसी राज्य का विधानमंडल, विधि द्वारा, पंचायतों के निर्वाचनों से संबंधित या संसक्त सभी विषयों के संबंध में उपबंध कर सकता है. 
34.        नगर परिषद में चुने जाने के लिए वह तभी योग्य होगा जब वह उस नगर मि मतदाता सूची में सम्मिलित हो. 
35.        न्यायिक पुनर्विक्षण पंचायती राज संस्थाओं की शक्तियों के अंतर्गत नहीं आता है. यह न्यायपालिका की शक्ति है. 
36.        बिहार पंचायती राज अधिनियम के तहत ग्राम न्यायालयों की व्यवस्था है जिन्हें 3 माह तक की जेल एवं 1000रू. तक जुर्माने की सजा सुनाने की शक्ति प्राप्त है. 
37.        राज्यवित्त आयोग के गठन का प्रावधान भारतीय संविधन के अनुच्छेद 243 (I)(झ) के अंतर्गत किया गया है. यह पंचायतों की वित्तीय स्थिति के पुनर्विलोकन के लिए गठित किया गया है. 
38.        संविधान के अनुच्छेद 243-(I) के अनुसार रज्य की पंचायतों द्वारा विनियोजित हो सकने वाले करों और शुक्लों आदि के निर्धारण हेतु संस्तुति के लिए एक वित्त आयोग होगा जिसका गठन राज्यपाल द्वारा प्रत्येक 5 वर्ष पर किया जाता है. 
39.        स्थानीय इकायों पर नागरिक की शिकायतों के मामलों में राज्य सरकार का नियंत्रण नहीं होता है. 
40.        भारतीय संविधान के अनुसार स्थानीय शासन के लिए उपबंध भाग 9 एवं भाग 9-क में किए गए हैं. अत: स्वतंत्र स्थानीय शासन का वर्णन किया गया है. 
41.        उप प्रभाग स्तर पर जिला परिषद – असम, मंडल प्रजा परिषद – आन्ध्रा प्रदेश, जनजातीय परिषद – मेघालय, ग्राम पंचायतों का अभाव- मिजोरम. 
42.        73वें संविधान संशोधन अधिनियम 1992 द्वारा संविधान में भाग 9 जोड़ा गया है. इस भाग में 16नए अनुच्छेद और एक नई अनुसूची-ग्यारहवीं अनुसूची जोड़ी गई. इस भाग में पंचायतों का गठन, उनके निर्वाचन, शक्तियों इत्यादि का वर्णन किया गया है. अनुच्छेद 243E(3)(6) के तहत पंचायत भंग होने पर 6 माह के अंदर निर्वाचन होना आवश्यक है. 
43.        जिला फोरम उन्हीं शिकायतों की सुनवाई करता है जिनमें माल या सेवाओं का कुल मूल्य 20 लाख रूपये से अधिक न हो. बीस लाख सेएक करोड़ तक के माल या सेवाओं के कुल मूल्य की सुनवाई स्टेट कमीशन जबकि एक करोड़ से ऊपर तक के माल या सेवाओं के कुल मूल्य की सुनवाई नेशनल कमीशन करता है. 
44.        भारत में वर्तमान में मिजोरम, दिल्ली एवं नागालैण्ड राज्यों में पचायती राज संस्था नहीं है. 
45.        गाजियाबाद में नगर पालिका परिषद नहीं बल्कि नगर निगम है. झारखण्ड में ‘पंचायत समिति’ का गठन झारखण्ड पंचायत राज अधिनियम, 2001 (2010 में यथा संशोधित) के अनुच्छेद 32 के तहत किया गया है. इसके सदस्य जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से चुने जाते हैं. 
46.        ब्लॉक स्तर पर पंचायत समिति एक प्रशासनिक प्राधिकरण के रूप में कार्य करती है. यह ग्राम पंचायत और जिला प्रशासन के मध्य संपर्क स्थापित करती है. क्षेत्र पंचायत में निर्वाचित सदस्यों द्वारा अपने में से एक प्रमुख, एक ज्येष्ठ उपप्रमुख तथा एक कनिष्ठ उपप्रमुख चुने जाएँगे. क्षेत्र पंचायतों को सौंपे गए कार्य समितियों के  माध्यम से  संचालित किए जाएँगे तथा इसके लिए निम्न समितियां गठित की जाएंगी – शिक्षा समिति, निर्माण कार्य समिति, नियोजन एवं विकास समिति, स्वास्थ्य एवं कल्याण समिति, व प्रशासनिक समिति. 
47.        ‘राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम’ (NREGA) अगस्त, 2005 में संसद द्वारा पारित हुआ था तथा इसे 2 फरवरी, 2006 से लागू कर आन्ध्र प्रदेश के अनंतपुर जिले में इस योजना का प्रारंभ किया गया था. 2 अक्टूबर,2009 से इसका नामकरण ‘महात्मा गाँधी नरेगा’ कर दिया गया था. इस योजना का उद्देश्य प्रत्येक वित्त वर्ष के दौरान प्रत्येक ग्रामीण परिवार (जिसके वयस्क सदस्य कार्य करने के इच्छुक हैं) को कम से कम 100 दिन दिन के अकुशल (unskilled manual work) रोजगार की गारंटी उपलब्ध कराकर ग्रामीण क्षेत्रों में आजीविका सुरक्षा को बढ़ाना है. 
48.        महात्मा गाँधी राष्ट्रीय रोजगार गारन्टी’ योजना में प्रत्येक ग्राम पंचायत’’ ग्राम सभा की सिफारिशों पर विचार करने के पश्चात एक विकास योजना तैयार करेगी तथा मांग के अनुसार कार्यों के क्रियान्वयन एवं निष्पादन के लिए स्वयं उत्तरदायी होगी.   

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